बुधवार, 25 सितंबर 2013

एकता परिषद की बैठक में अनेकता के सुर : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर
साम्प्रदायिक तनावों एवं सामुदायिक विभाजनो को दूर करने के लिए बुलाई गयी
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक खुद ही आपसी आरोप-प्रत्यारोप और सियासी छीटाकसी की भेंट चढती नजर आई ! राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक की पहली दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यही है कि सदभाव कायम करने के इस अहम मसलेपर बुलाई गयी बैठक में कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कई राजनीतिक दलों के प्रमुख शामिल होने तक से परहेज कर लिए ! परम्पराओं एवं नियामकों के अनुसार राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में  पहले तक परिषद के सदस्यों एवं राजनीतिक दलों के प्रतिनिधी नेताओं के अलावा प्रत्येक राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते रहे हैं ! लेकिन इस बार हुई 16वी बैठक में मात्र सोलह राज्यों के मुख्यमंत्रियों का हिस्सा लेना एव शेष राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित कई दलों के आला नेताओं का इस बैठक से किनारा करना बेहद निराशाजनक कदम कहा जा सकता है ! सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये है कि मुज्जफरनगर मसले पर समाजवादी पार्टी सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप गढ़ने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ-साथ प्रधानमंत्री पद के भाजपा घोषित उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बैठक से नदारद रहे !  हालाकि  राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक को लेकर सवालों की सुई उनके ऊपर तो उठती ही है जो इस बैठक को दरकिनार कर दिये लेकिन बैठक में शामिल हुए प्रतिनिधियों पर भी कम सवाल नहीं उठते हैं ! समाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के नाम पर बुलाई गयी यह बैठक सियासत के दरारों में विभाजित होती दिखी और आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ गयी ! राष्ट्रीय एकता के नाम पर बुलाई गयी इस बैठक के हासिल के तौर पर ना तो कोई आम सहमति के साथ आगे बढ़ने का निर्णय नजर आया और ना ही ऐसीकोई नीतिगत चर्चा ही नजर आई जिसके आधार पर इस बैठक की सफलता को प्रमाणित किया सकता हो ! सियासत से ऊपर उठते हुए आम सहमति की बजाय सभी शामिल प्रतिनिधी अपनी ढपली अपना राग का जाप करते नजर आये ! इस बैठक में शामिल प्रधानमंत्री सहित अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा बैठक में रखीगयी बातों पर अगर गौर करें तो उनके द्वारा दिये गए सभी बयान सिवाय अपनी सियासी कवायदों के कुछ नहीं नजर आयेंगे ! सभा की शुरुआत करते हुए ही प्रधानमंत्री द्वारा भाजपा और सपा पर निशाना साधने को बैठक की उद्देश्यों  के लिहाज से बेहद गलत शुरुआत कही जा सकती है ! सपा और भाजपा को निशाने परलेते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन द्वारा साम्प्रदायिक दंगो के प्रति केंद्र सरकार की जवाबदेही से साफ़ तौर पर किनारा करने को बेहद गैरजिम्मेदाराना बयानही कहा जाएगा जो कि इन नाजुक परिस्थितियों में एक देश के प्रधानमंत्री द्वारा उस समय तो नहीं ही दिया जाना चाहिए था  जब राष्ट्रीय एकता की बैठक बुलाई गयी हो । गौरतलब है कि बैठक की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री ने साफ़ तौर पर कहा कि साम्प्रदायिक दंगो के लिए राज्य जिम्मेदार है केंद्र नहीं । लिहाजा जब प्रधानमंत्री द्वारा सभा की सियासी शुरुआत कर दी गयी तो भला बाक़ी लोग कैसे चुप रहें ! भाजपा के इकलौते शामिल हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंहचौहान ने अपनी पार्टी के बयानों को ही दोहराते हुए पुरे दंगे को तुष्टिकरण से जोड़ दिया तो वहीँ अखिलेश यादव  और नितीश कुमार ने धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिकता आदि का हवाला देकर भाजपा पर निशाना साधा ! इस पुरे बैठक में तकरीबन उतनी ही बातें बोली गयीं जितनी आम सभाओं या मीडिया में पहले से  बोली जाती रही हैं ! ऐसे में बड़ा सवाल है कि फिर इस विशेष बैठक का औचित्य क्या था और यह बैठक क्यों होनी चाहिए थी ?     दरअसल इस पुरे बैठक में सिवाय अपनी-अपनी सियासत पुख्ता करने के कुछ भी नही हुआ है !सही मायनों में अगर देखा जाय तो राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक में उन उपायों पर बात कीजानी चाहिए थी कि जिनके द्वारा दंगों के खिलाफ राजनितिक एवं प्रशासनिक एकजुटता  कायम की जा सकती हो ! सरकारी स्तर पर बुलाई गयी इस बैठक में एक मुख्यमंत्री और एक प्रधानमंत्री की प्रथम जवाबदेही अपने राज्य अथवा देश के प्रति होनी चाहिए जहां कि जनता ने उसे अपना जनादेश सौपा है न कि अपने राजनीतिक दल के प्रति । हाँ इस बैठक में दंगों को लेकर अपनी जवाबदेही तय करने का नैतिक साहस भले किसी में न दिखा हो लेकिंन सोशल मीडिया  पर दंगो का ठीकरा फोड़ने को लेकर एक अद्द्भुत राजनीतिक एका देखने को मिला । राष्ट्रीय एकता परिषद इस बैठक में सोशल मीडिया पर लगाम कसे जाने को लेकर क्या पक्ष औरक्या विपक्ष,सभी एकजुट नजर आये । पूरी बैठक में यही वो एकमात्र मुद्दा रहा जहां आपसी विरोधाभास नहीं देखा गया । बड़ा सवाल ये है कि जब भी कोई अप्रिय घटना होती है तो हमारे राजनितिक जमात द्वारा सोशल मीडिया को ही निशाना बनाकर ऐसे एकजुटता दिखाई जाती है मानो अमुक घटना के पीछे एक मात्र कारण सोशल मीडिया की व्यापकता ही हो । इस सन्दर्भ में इस बात को बेशक स्वीकारकिया जा सकता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाह आदि को फैलाया जाता है मगर इसे इस स्तर पर भी नहीं स्वीकार किया जा सकता कि हमारी सरकार अपनी जवाबदेही को ताक़ पर रखकर सारा ठीकरा सोशल मीडिया पर फोड़ दें । फिलहाल इतना तो तय है कि अलग-अलग तरह के बहानो से सोशल मीडिया पर कवायदें तो चल ही रहीहैं ।खैर,जो भी हो फिलहाल दंगो पर भविष्य  में नियंत्रण रखने एवं संघीय स्तर पर एकजुटता के दिशा में कोइ साकारात्मक परिणाम आते नहीं दिख रहे सिवाय आपसी नूराकुश्ती के ।इस तरह की बैठक की औपचारिकताओं से ना तो दंगो के दंश से छुटकारा मिलता दिख रहा है ना ही साम्प्रदायिक सदभाव की दिशा में ही कोई राजनितिक इच्छा शक्ति को ही बल मिलता दिख रहा है ।  सही बात तो ये है कि हमारे रहनुमाओं में साम्प्रदायिक सदभाव कायम करने की नीयत ही नहीं है और वोआज भी इसे राजनितिक एजेंडे के तौर पर हवा देकर अपने वोटबैंक दुरुस्त करने में लगे हुए हैं । अगर वाकई साम्प्रदायिक सदभाव और राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण भाव होता तो कम से कम 12 राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा इस बैठक का बहिष्कार नही किया गया होता और मायावती सरीखे उत्तरप्रदेश के नेता संयुक्त प्रयासों के इस पहल से किनारा करते नहीं नजर आते । ये सच है कि प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा समर्थित दावेदार होने के नाते नरेन्द्र मोदी इस बैठक से किनारा किये लेकिन बेहतर होता कि अगर वो भी इस बैठक में आकरअपनी बात रखे होते । भला यह देश उस व्यक्ति को बतौर अपना प्रधानमंत्री कैसे स्वीकार करेगा जो सौहार्द के इस मसले पर मंच तक आने से परहेज कर रहा हो । नरेन्द्र मोदी नही आये ये उनका राजनितिक फैसला है लेकिन दस्तूर और मौका यही कहता है कि उन्हें आना चाहिए था । खैर जो भी हो इतना तो तय है कि एकता केनाम पर बुलाई गयी इस बैठक में सबसे ज्यादा सियासी विभेद देखने को मिला जो कि राष्ट्रीय एकता के लिए अच्छे संकते के तौर पर नहीं देखा जा सकता है ।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

खूब खलेगी मोहन सिंह की कमी : डीएनए में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर

ऐसे समय में जब उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार
मुज्जफरनगर मामले में पूरी तरह घिरी हुई है और उसके समाजवादी विचारधारा की शुचिता पर सवाल उठ रहे हैं,ऐसे में लोहिया और जनेश्वर मिश्र के पथ पर आजीवन चलने वाले तेज तर्रार समाजवादी नेता मोहन सिंह का जाना सपा के लिए अपूरणीय छति की तरह है ! समाजवादी पार्टी को पिछले तीन सालों में हुई पारंपरिक समाजवादियों के रूप में यह तीसरी छति है ! यों तो परिवाद के आरोपों से हमेशा दो-चार होती रहने वाली समाजवादी पार्टी में मोहन सिंह उन नेताओं में से एक थे जो सभी परिस्थितियों में अपने राजनितिक आदर्शों और समाजवाद की बुनियादी शर्तों के साथ जीवन यापन किये ! साठ के दशक में जब कांग्रेस विरोधी आंदोलन की बुनियाद रखी गयी थी और समाजवादी लेखक मधु लिमये सरीखे लोगों द्वारा इलाहाबाद में आंदोलन को समर्थन दिया जा रहा था, उस दौरान मोहन सिंह भी उस आंदोलन से जुड़ गए ! अपनी राजनैतिक कुशलता के  कारण ही सन 1968-69 में वो इलाहाबाद विश्वविद्द्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष भी चुने गये थे !   आज जब उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार के समक्ष तमाम विपरीत परिस्थितियां हैं और  लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती भी शुरू है, ऐसे में समाजवादी पार्टी के सबसे लंबे समय तक सचेतक के रूप में काम करने वाले मोहन सिंह की कमी ना सिर्फ खलेगी बल्कि उसका असर चुनावों में भी दिखेगा !  मोहन सिंह काफी समय से देवरिया सदर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते और चुने जाते रहे हैं, जहाँ उनका सीधा मुकाबला भाजपा से होता रहा है ! हालाकि पिछली बार यह समीकरण टूट गया था और देवरिया सीट बसपा के खाते में चली गयी थी,लिहाजा उन्हें राज्यसभा में बैठना पड़ा था ! ओजस्वी वक्ता और कद्द्वारा नेता के रूप में ख्यातिलब्ध मोहन सिंह के राजनैतिक आदर्श भी बेहद साफ़-सुथरे रहे हैं और वो कभी भी ना तो खुद को समाजवादी पार्टी के ऊपर खड़ा करने की कोशिश किये और ना ही कभी अपने राजनैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते ही देखे गए हैं ! अभी एक साल ही हुए जब डीपी यादव मामले में अखिलेश कि खिलाफत करने के कारण उन्हें पार्टी के प्रवक्ता पद से हटा दिया गया था उस दौरान भी वो कद्दावर नेता चुप रहा था ! हालाकि मोहन सिंह के जाने से अगर सबसे ज्यादा प्रभावित कोई जगह है तो वो है देवरिया लोकसभा सीट ! मोहन सिंह के अत्यंत करीबी बताते हैं हैं कि मोहन सिंह अपनी राजनितिक विरासत अपनी बेटी कनकलता को सौपना चाहते थे और इसकी शुरुआत पिछले साल कई कार्यक्रमों में हो भी चुकी थी ! शायद मोहन सिंह की ऐसी इच्छा रही हो कि उनकी पुत्री कनकलता को उनके लोकसभा सीट देवरिया से आगामी लोकसभा चुनाव में टिकट दिया जाय लेकिन ऐसा हो नहीं सका ! कारण जो भी हों लेकिन देवरिया लोकसभा सीट से कनकलता को टिकट ना मिलने के बावजूद मोहन सिंह कभी इस मामले को सार्वजनिक नहीं किये जबकि इसी समाजवादी पार्टी में खून के रिश्तों में ही पिता,पुत्र और बहु तीनो राजनीति में घुसाए गए हैं ! फिलहाल मोहन सिंह के आकस्मिक मृत्यु के बाद देवरिया के समीकरण थोड़े बदलते से दिख रहे हैं और अपने राज्यसभा के अधूरे कार्यकाल में ही परलोक सिधार गए मोहन सिंह की पारंपरिक सीट पर सहानुभूति के आधार पर शायद कोई बड़ा फेरबदल देखा जाय ! मोहन सिंह के निधन की खबर आते ही देवरिया शहर में ना सिर्फ शोक की लहर दौडी बल्कि राजनितिक कयासबाजियां भी तेज हो गयीं ! चुकी, देवारियां लोकसभा सीट पर बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर कमलेश शुक्ल को अपना उमीदवार घोषित किया है एवं सपा ने पूर्व आईएएस रामेन्द्र त्रिपाठी को उम्मीदवार घोषित किया है ! भाजपा ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं लेकिन देवरिया सीट के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही और पूर्व सांसद श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी के बीच रस्साकसी की अंदरूनी ख़बरें देवारियां की सडकों पर आम हैं ! अगर वर्तमान स्थिति के आधार पर आगमी चुनाव का आकलन करें तो रामेन्द्र त्रिपाठी की स्थिति बेहद नाजुक है और वो यहाँ से तीसरे नम्बर पर रह सकते हैं जबकि सीधी लड़ाई भाजपा और बसपा के बीच होनी है ! अब जब मोहन सिंह जो कि देवरिया से सपा के प्रत्याशी हुआ करते थे उनके निधन की सहानुभूति के तौर पर उनकी अंतिम इच्छा पूरी करते हुए रामेन्द्र त्रिपाठी का टिकट काट दिया जाता है और कनकलता को टिकट दिया जाता है तो समीकरण पूरी तरह से पलट जायेंगे ! हालाकि अंदरूनी तौर पर ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि रामेन्द्र त्रिपाठी को बैठना पड़ेगा क्योंकि पिछली बार गँवा चुकी इस लोकसभा सीट को पुन: मोहन सिंह के विरासत के रूप में उनकी पुत्री को देने से समाजवादी पार्टी को भी परहेज नहीं होगी ! मोहन सिंह की व्यक्तिगत और पारिवारिक दोनों छवियाँ बेहद साफ़-सुथरी रही हैं अत: सपा मौके की नजाकत को देखते हुए कनकलता को टिकट दे सकती है !
     फिलहाल भविष्य में जो भी लेकिन मोहन सिंह के आकस्मिक निधन से देश की समजवादी विचारधारा को एक बड़ा नुकसान हुआ है जिसकी भारपाई वाकई संभव नहीं है ! मोहन सिंह उस दौर में समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े जब समाजवादी पार्टी की बुनियाद रखी जा रही थी और अखिलेश सरीखे समाजवादी नेता तब बहुत छोटे-छोटे बच्चे होंगे ! लेकिन समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का ऐसा दुष्चक्र पैदा हुआ कि समाजवाद का झंडा उठाने वाले कैडर नेता हाशिए पर चले गए और अखिलेश सरीखे नए और अनुभव हीन चेहरे सत्ता पर आसीन हो गए ! छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र और समाजवादी  बी के तिवारी की कतार को बढाने वाले मोहन सिंह के निधन ने फिलहाल इस कतार को विराम दे दिया है और उत्तप्रदेश की समाजवादी पार्टी में अब कोई समाजवादी बचा है ऐसा नहीं कहा जा सकता ! अगर वाकई समाजवाद अपनी शुचिता के साथ कायम होता तो मुख्यमंत्री जैसे पदों पर मोहन सिंह और जनेश्वर मिश्र जैसे लोग एक बार जरुर पहुचे होते ! जिस राज्य में कई बार समाजवादी पार्टी की सरकार बनी हो और वहाँ एक बार भी कोई पारंपरिक समाजवादी मुख्यमंत्री ना बन पाया हो तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा ! मुलायम सिंह बेशक समाजवादी राजनीति के प्रणेता रहे हों लेकिन अब वो किसी भी नजरिये से समजवादी नहीं रहे और परिवारवाद से ग्रसित एक कुटिल राजनेता बन चुके हैं ! मोहन सिंह जैसे नेता वाकई सच्चे समाजवादी थे और उनका जाना किसी राजनितिक दल और किसी लोकसभा सीट से ज्यादा एक विचारधारा और एक आंदोलन की छति है जिसको कभी पूरा नहीं किया जा सकता !

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

अमेरिकी हार है सीरिया युद्ध का टलना : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकाशित

  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
हाल ही में सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों का प्रयोग किये जाने को
मुद्दा बनाकर अमेरिका द्वारा सीरिया पर हमला करने का एलान किया गया जिसका अन्तराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विरोध देखा गया । सीरिया पर हमले को लेकर अमेरिका द्वारा ये दलील दी जाती रही कि सीरिया द्वारा रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया है जिसमे हजारों लोग मरे हैं और इससे विश्व में शान्ति का संकट पैदा हो सकता है । सीरिया मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप का आलम यहाँ तक पहुच गया कि अमेरिका द्वारा कई युद्ध पोत और युद्ध सामग्री सीरिया सीमा की तरफ समुद्री मार्ग से भेज दी गयी । इस पुरे मसले पर अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका की भी परवाह न के बराबर ही की गयी । हालाकि इस मामले में सबसे पहले हस्तक्षेप करते हुए दुनिया की एक अन्य महाशक्ति रूस ने अमेरिका से अपील की कि उसे सीरिया पर हमले को लेकर इस कदर उग्र नहीं होना चाहिए । रूस के अलावा चीन और ब्रिटेन भी अमेरिका द्वारा सीरिया पर हमला करने के पक्ष में नहीं दिखे और अपना विरोध दर्ज कराये । दरअसल इस पुरे मामले को केवल रासायनिक हथियारों के प्रयोग पर अमेरिकी आपत्ति के लिहाज से देखना प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता । अगर देखा जाय तो सोबियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में उभरी अमेरिका की नीति सदैव से ही विश्व की आर्थिक एवं प्राकृतिक संपदाओं के श्रोतो पर अपने नियंत्रण को कायम करने की रही है । अमेरिका द्वारा इसी नीति के तहत मानवाधिकार एवं लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर ईराक का युद्ध भी लड़ा गया था । दरअसल ईराक युद्ध में भी अमेरिका की नजर ईराक में अकूत मात्रा में उपलब्ध तेल पर थी ।अंतराष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का हवाला देकर अमेरिका द्वारा हमेशा से ही अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया जाता रहा है और अपनी तानाशाही दिखाई जाती रही है । बहरहाल इस पुरे मामले में युद्द की जिद पर अड़े अमेरिका पर रूस और चीन ने दबाव बनाते हुए इस बात की पुरजोर पहल की कि इस सीरिया के रासायनिक हथियारों के प्रयोग करने के मसले को युद्ध की बजाय अन्य विकल्पो से सुलझाया जाय । हालाकि अमेरिका को लेकर कमोबेश हर मसले पर रूस और चीन का स्पस्ट विरोध देखा जाता है । चीन और रूस द्वारा अमेरिका ले विरोध का सबसे बड़ा कारण ये है की क्षेत्रफल और शक्ति सम्पन्नता के लिहाज से दोनों अमेरिका के प्रतिस्पर्धी हैं । विघटन से पूर्व तो रूस की अंतर्राष्ट्रीय शक्ति क्षमता अमेरिका के समानांतर हुआ करती थी । सीरिया पर हमला करने के वास्तविक मंसूबों को बारीकी से समझते हुए रूस ने इस बात के लिए पुरजोर पहल की कि जैसे भी हो इस युद्ध को टाला जा सके । चूकी रूस यह बखूबी जानता है अमेरिका द्वारा जब भी कहीं हमला किया जाता है तो यह अमेरिका के लिए फायदेमंद साबित होता है । सीरिया पर अमेरिकी हमले को टालने के लिए प्रतिबद्ध रूस ने अन्तराष्ट्रीय पहल करते हुए सीरिया के राष्ट्रपति बल अशर असद  को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वो अपने रासायनिक हथियार अंतराष्ट्रीय समुदाय को सौप दे और रासायनिक हथियारों के निषेध संधि पर हस्ताक्षर करते हुए इस समुदाय की सदस्यता ग्रहण कर ले । गौरतलब है कि सीरिया अबतक उन सात देशों में था जो इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये थे । अमेरिकी तानाशाही के मंसूबों पर पानी फेरते हुए रूस ने न सिर्फ दुनिया को एक युद्ध से निकाला है बल्कि अपनी अंतराष्ट्रीय समझदारी के तहत अमेरिकी नीतियों को खारिज भी कराया है । गौर करना होगा कि कई मामलों में देखा गया है कि जब किसी तरह की कोई असंतुलित करने वाली अंतराष्ट्रीय घटना होती है तो सबसे पहले युद्ध की जल्दी अमेरिका ही दिखाता है । लेकिन सीरिया के मसले में रुसी हस्तक्षेप ने अमेरिकी मंसूबों को अपनी कूटनीतिक पैतरों से धुल चटाने का काम किया है । सीरिया पर हमले को लेकर अपना खुला विरोध दर्ज करा रहे रुसी विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी से मुलाक़ात में इस बात का दबाव बनाया कि अमेरिका युद्ध को लेकर इतना अधिक जल्दीबाजी न दिखाए । रुसी विदेश मंत्री द्वारा की गयी इस मुलाक़ात को अमेरिकी मनमानी पर नकेल कसने की कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए । आज पुरे विश्व को यह समझने की जरूरत है कि अपने निजी हितों एवं वैश्विक सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए अमेरिका किसी ना किसी बहाने उन देशों को निशाना बनाने का प्रयास करेगा जिनसे वो संसाधनों का मनमाना दोहन कर सके और अपनी सर्वोच्चता का झंडा बुलंद कर सके । हालाकि सीरिया को लेकर रूस का रुख इस बात का सुबूत है कि अब अमेरिकी तानाशाही को कुटनीतिक चुनौतियाँ मिलने लगी हैं और उसका यह मनमाना व्यवहार दुनिया को स्वीकार्य नहीं है । रूस की पहल पर टाले गए इस युद्ध को अमेरिकी तानाशाही की हार और विश्व शान्ति की स्थापना में रूस और सीरिया की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए । चुकि सीरिया के मामले में अमेरिका द्वारा सीरिया पर रासायनिक हथियारों के समर्पण का दबाव कभी नहीं बनाया गया बल्कि शुरू से ही अमेरिका का युद्धोन्मादी चेहरा सामने आता रहा । अमेरिका का गाहे-बगाहे  उभरता रहने वाला यही युद्धोन्मादी चेहरा इस बात की तस्दीक करता है कि अमेरिका शान्ति और शक्ति संतुलन की बजाय निजी हितों की लडाइयां लड़ता रहा है । आज सीरिया पर युद्ध का गहराता संकट अगर टल गया है तो इसे अमेरिकी मंसूबों की शिकस्त एवं सीरिया के जीत रूप में देखने की जरुरत है ।      

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव से हुई किताब चर्चा : नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

रविवार, 8 सितंबर 2013

कुछ पूछती तो कुछ बताती कवितायें : दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरी समीक्षा











  • शिवानन्द  द्विवेदी सहर
लन्दन में रह रहीं संस्मरण लेखिका शिखा वार्ष्णेय संस्मरण के अलावा कविताएं भी
लिखती हैं,ये बात मुझे तब पता चली जब उनकी कविता संग्रह “मन के प्रतिबिम्ब” मुझे पढ़ने को मिली ! कुल इक्यावन कविताओं वाले इस कविता संग्रह की हर कविता के पास अपनी भाव-संपदा,कथ्य-सम्पदा तो है ही साथ ही साहित्य की काव्य विधा के हर मानक पुष्ट होते नजर आते हैं ! वैसे यह पूरा काव्य संग्रह दो तरह की कविताओं में वर्गीकृत होता है ! इस काव्य संग्रह की कुछ कवितायें समाज से,खुद से और अनाम किसी से कुछ सवाल पूछती हुई आगे बढ़ती हैं तो कुछ ऐसी भी कवितायें भी हैं जो जवाब के रूप में बहुत कुछ बताती नजर आती हैं ! कविता संग्रह की तीसरी कविता “चीखते प्रश्न” की अगर बात की जाय तो वाकई यह कविता एक जीवंत सवाल की तरह समाज से टकराती नजर आती है ! बेहद सहज और सरल शब्दों में भारतीय महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी मांगती कविता “चीखते प्रश्न” निश्चित तौर पर इस कविता संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक है-

          कैसे कहूँ मै भारतीय हूं
              क्यों करूँ मै गुमान
आखिर किस बात का
जो इन्डियन शब्द निकलते ही
लग जाते हैं पीछे ...
वही न,
जहाँ रात तो छोड़ो
दिन में भी महिलाएं
नहीं निकल सकतीं घर से ?
एक लेखक अथवा एक कवि का पहला दायित्व ये होता है कि वो अपने सृजन के प्रति ईमानदार बने और अपने शब्दों और भावों के बीच सुन्दर और गैर-बनावटी समन्वय स्थापित करते हुए अपनी कृति को देशकाल और समाज के बने सांचों में कहीं ना कहीं फिट कर सके ! इसमें भी कोई संदेह नहीं कि कविता कभी भी कथन नहीं हो सकती अथवा कुछ कह देना मात्र ही कविता के मानकों को पुष्ट नहीं कर सकता ! सही अर्थों में देखा जाय तो कथ्य और भाव को जब किसी परिस्थिति से जोड़ लेने में कवि सफल जाता है तो कविता भी सफल हो जाती है ! मन के प्रतिबिम्ब कविता संग्रह में लेखिका ने अपनी कविता “प्रलय...बाकी है” के माध्यम से समाज के एक कुरूप चेहरे को बड़ी साफगोई से दिखा पाने में सफल होती हैं-
          तभी प्रकट हुई एक टोली
          वहशी,दानवों से वे भोगी
          इंसानों के इस दुनिया में
          पशुवत,कुंठित व मनोरोगी
          पल भर में बदल गया दृश्य
          क्षत-विक्षत पड़ी वो भोली !! (दामिनी प्रकरण पर)
मन के प्रतिबिम्ब कविता संग्रह की कवितायें ऐसी भी हैं जो सवाल और समाधान के बीच के टकरावों में समाधान के गुंजाइशों की एक किरण ना सिर्फ तलाश पाने में सफल होती हैं बल्कि समाज को संकेतों में ही उन गुंजाइशों से अवगत भी कराती हैं ! यह कहने में पाठक को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि लेखिका द्वारा रचित कविता “यतीम” हमारे वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के नजरिये से बेहद प्रासंगिक और यथार्थ के करीब प्रतीत होती है ! यतीम कविता का पहला चरण भारत के अनाथ बच्चों की दुर्दशा का सजीव और मार्मिक चित्रण करता है तो वही अपने प्रारब्ध तक जाते-जाते यह कविता इस समस्या के समाधान के कई साकारात्मक-नाकारात्मक पहलुओं को करीब से छुती नजर आती है –
          एक रात वहीँ
          कोई टोकरी में छोड़ गया था उसे,
          शायद अँधेरे में
          उसका रंग और मुस्कान
          नजर न आये हों उन्हें
          पर आज तो धुप है गहरी
          सब दिखेगा साफ़-साफ़
          यक़ीनन आज उसकी बारी है
          नए मम्मी पापा मिलने की....
भारतीय समाज और देशकाल से जुड़ी इन सभी कविताओं का लेखन लन्दन में रह रहीं लेखिका द्वारा होना भी सामाजिक जुडाव का एक अद्दभुत कौशल है ! इन कविताओं में ना तो किसी तरह का कोई बनावटीपन ही है और ना ही इनमें शाब्दिक जटिलता है ! ये कवितायेँ कुछ यूँ हैं मानो लिखी और प्रस्तुत नहीं की गयीं हों बल्कि परोसी गयी हों ! वाकई एक कविता पाठक से तभी जुड़ पाती है जब वो परोसी जाय ! इन तमाम कविताओं के अलावा भी तमाम कवितायें जैसे- मै तेरी परछाई हूँ,बर्फ के फाहे,गूंगा चाँद,मै बनाम हम, यही होता है रोज, इस पुरे कविता संग्रह की महत्वपूर्ण कवितायें हैं ! एक कविता “किस रूप में चाहूँ तुझे मै” में लेखिका श्रृंगार और विछोह के बीच मद्धम गति से चलने वाली उस नाव की नाविका बन जाती हैं जो किनारों को तलाशती तो है मगर किनारों का हर रूप उसे पसंद नहीं आता ! निश्चित तौर पर अपनी इक्यावन कविताओं के साथ यह कविता संग्रह “मन के प्रतिबिम्ब” एक सफल कृति है ! इस कविता संग्रह की सबसे बड़ी खासियत इसका भोलापन है ! जटिलताओं के दौर में उलझती आज की नई कविताओं के बीच कोई सीधी-साधी और भोली-भाली कविता मिल पाने अन्यत्र जितना मुश्किल है, यहाँ उतना ही आसान ! अपनी तमाम साकारात्मक पहलुओं को सहेजे यह कविता संग्रह खुद को स्वत: ही एक सफल किताब की शक्ल में तब्दील कर लेता है ! लेखिका की एक कविता से ही यह पूरा विश्लेषण पुष्ट होता नजर आता है अत: मै उसी कविता को यहाँ रखते हुए  शुभकामनाओं के साथ अपनी बात खतम करता हूँ-
          कभी देखो इन बादलों को
          जब काले होकर आसुओं से भर जाते हैं,
          तो बरस कर इस धरा को ढो जाते हैं
          कभी देखों इन पेड़ों को
          पतझड के बाद भी
          फिर फल-फुल से लड़ जाते हैं,
          कभी देखो इन नदियों को
          पर्वत से गिरकर भी,
          चलती रहती हैं !!.......................समाप्त     


शनिवार, 31 अगस्त 2013

साहित्य-संस्कृति के समृद्धि का सेतु : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

राष्ट्रीय सहारा
साहित्य की आम धारणाओं के अनुसार किसी भी भाषा में लिखी गयी लिपिबद्ध सामग्री को किसी दूसरी भाषा में ज्यों का त्यों बिना उसके मूल तथ्यों से छेड़-छाड़ किये लिखा जाना ही अनुवाद-कर्म कहलाता है ! अनुवाद-कर्म के संदर्भ में  यह आम धारणा जितनी सहज और सपाट  नजर आती है वास्तविकता के धरातल पर इसके मायने उतने ही बहुआयामी हैं ! अनुवाद-कर्म  का दायरा सिर्फ साहित्य की तमाम विधाओं और बहु-भाषाओं में अनुवादक की निपुणता तक सीमित नहीं है ! वास्तविक तौर पर अगर देखा जाय तो अनुवाद-कर्म  एक राष्ट्रीय कर्म है जो कभी एक राष्ट्र की संस्कृति को दूसरे राष्ट्र की संस्कृति से जोड़ने का काम करता है तो कभी एक समाज को दूसरे समाज के साथ जुडने के लिए प्रेरित करता है ! सीधे-सपाट शब्दों में अगर कहा जाय तो संकुचित और शिथिल पड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपदाओं को  विस्तार देने का एकमात्र माध्यम अनुवाद ही है ! साहित्य में सृजन और रचनाकर्म के समानांतर या उससे एक कदम आगे बढ़कर ही अनुवाद की भूमिका है ! सृजन महज किसी रचना अथवा कृति को मूर्त रूप देता है जबकि अनुवाद की भूमिका उस सृजन और बहु-संस्कृतियों के बीच समन्वय-सेतु बनकर उस रचनाकर्म को  गतिशील बनाने की होती  है ! भारतीय साहित्य के संदर्भ में अगर वर्तमान अनुवाद-कर्म का मूल्यांकन किया जाय तो स्थिति उतनी संतुष्टिपरक नहीं नजर आती जितनी की जरुरत है ! ऐतिहासिक रूप साहित्य और सृजन की दिशा  में अनुवाद और अनुवादक दोनों ही आदिकाल से ही प्रासंगिक रहे हैं ! अनुवादक एक प्रकार का भाषाई दूत होता है जो अपने प्रयासों से किसी एक भौगोलिक चारदीवारी में सिमटती साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्पदा को भूगोल की सीमा से बाहर ले जाते हुए अन्य संस्कृतियों से रूबरू कराता है ! अनुवाद और अनुवादक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कालजयी कृति मधुशाला के रचयिता डा. हरिवंश राय बच्चन कहते हैं  अनुवाद एक भाषा का दूसरे भाषा की तरफ बढ़ाया गया मैत्री का हाथ होता है ! मैत्री का यह हाथ अधिकतम जितनी बार और जितनी दिशाओं में संभव हो सके बढ़ाया जाना चाहिए !” अनुवाद कोई साहित्य के आधुनिक काल में  खोजी गयी कला नहीं है बल्कि यह आदि काल से सामाजिक जरुरत के रूप में चली आ रही प्रथा है ! बेशक समय के साथ-साथ साहित्य के तमामों कालों का प्रभाव अनुवाद-कर्म पर पड़ता रहा हो लेकिन अनुवाद का इतिहास तो हजारों वर्ष पुराना ही नजर आता है ! अनुवाद-कर्म के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अगर नजर डाले तो आज के लगभग डेढ़ दशक पूर्व चौथी शताब्दी के अंतिम दौर में चीनी यात्री फाहियान द्वारा लगभग पच्चीस वर्षों तक भारत भ्रमण कर साहित्यिक संपदाओं का संकलन तैयार किया गया ! तत्कालीन दौर में हिंदी नामक कोई भाषा वजूद में नहीं थी और लगभग सभी ख्यातिलब्ध साहित्यिक सामग्री संस्कृत में उपलब्ध थी ! अत: फाहियान ने भारत यात्रा के दौरान संस्कृत व्याकरण का गहन अध्यन किया एवं यहाँ से कई पुस्तकों का संकलन लेकर चीन वापस लौटा जहाँ उसका चीनी भाषाओं में अनुवाद किया गया ! ऐसी मान्यता है कि अनुवाद-कर्म के मामले में चीन का इतिहास भारत से ज्यादा समृद्ध रहा है और चीनी यात्रियों ने दुनिया के हर कोने से लाये गए विभिन्न भौगोलिक संस्कृतियों का अनुवाद किया है ! अनुवाद के इतिहास का पहिया कभी जड़ नहीं रहा है बल्कि सदा ही गतिशील रहा है ! संस्कृत से चीनी भाषाओं में अनुवादित सामग्री सातवीं शताब्दी के शुरुआत में ही जापान पहुँच चुकी थी और उसका जापानी भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका था ! अनुवाद का इतिहास कम से कम इतना तो जरुर बता पाने में सक्षम होता है कि अनुवाद-कर्म कोई साहित्य की नई-नवेली विधा नहीं बल्कि साहित्य की सबसे पुरानी रीतियों में से एक है !
      साहित्य और संस्कृति के समृद्ध होने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका पर तो कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता ! लेकिन सवाल की सुई भारतीय बहुभाषाई साहित्यिक सम्पदा में अनुवाद-कर्म की जड़ता पर जरुर उठते रहे हैं ! सांस्कृतिक एवं भाषाई पृष्ठिभूमि के नजरिये से भारत एक बहुभाषाई भूगोल में फैला देश है ! सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधताओं के बीच अनुवाद-कर्म के प्रति हमारा रुझान किस स्तर का है इसका मूल्यांकन अवश्य किया जाना चाहिए ! बड़ा सवाल ये है अनुवाद-कर्म के माध्यम से दुनिया को अपनी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संपदा उपलब्ध कराने वाला भारत क्या आंतरिक भाषाओं के बीच अनुवाद को उतना महत्व दे रहा है जितना कि वाकई दिया जाना अत्यंत जरूरी है ? साहित्य एकादमी के अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार विश्वनाथ तिवारी ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा “हमें समस्त चौबीस भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने पर काम करना होगा ! सभी चौबीस भाषाओं के बीच आपसी समरसता एवं सामंजस्य को बिठाए बिना अगर हम किसी एक भाषा को ही ढोने लगेंगे तो कहीं ना कहीं हम अपनी सम्पूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपदाओं को दुनिया के सामने नहीं रख पायेंगे !” डा. विश्वनाथ तिवारी के इन वक्तव्यों के मायनों को गहराई से समझने की जरुरत है ! भाषाओं को आधारभूत मानकर पचास के दशक में हुए राज्यों के गठन ने देश में भाषाई वैमनष्य की भावना को बल दिया जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय भाषाएँ ही एक दूसरे से जुडने की बजाय दूर होती गयीं ! अनुवाद-कर्म के मामले में जितना काम हिंदी साहित्य  के अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद पर हुआ है उसका दशांश भी भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद पर नहीं हुआ है ! भारत की तमाम भाषाओं में सृजित साहित्य का अनुवाद भारतीय भाषाओं में ही ना हो पाने का परिणाम है कि हम दक्षिण से उत्तर तक एक सार्वभौमिक संस्कृति स्थापित करने में नाकाम रहें हैं ! आंतरिक भाषाई द्वेष ने अनुवाद-क्रम को प्रभावित किया तो वहीँ अनुवाद ना होने के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी ना के बराबर रहा ! विविधताओं वाले इस देश में जहाँ दो दर्जन से ज्यादा भाषाएँ अपने साहित्यिक समृद्धि एवं संपदाओं के साथ अलग-अलग भौगोलिक दायरों में बंटी हुई हैं उसमे अनुवाद ही एकमात्र ऐसा माध्यम दिखता है जिसके द्वारा इस सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विषमता की गहरी होती खाई को पाटा जा सकता है !  भारतीय सांस्कृतिक विविधताओं में यह वक्तव्य बेहद सटीक एवं प्रासंगिक लगता है जिसमे डा. गोपीनाथन कहते हैं “भारत जैसे बहुभाषी लोगों के देश में अनुवाद की उपादेयता स्वयंसिद्ध है!”
      इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख मजबूत करनी है तो उसे अपनी सम्पूर्ण सांस्कृतिक उर्जा का प्रदर्शन करना होगा ! सम्पूर्ण सांस्कृतिक उर्जा का प्रदर्शन तभी संभव है जब भारत की समस्त साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्पदा का एकत्रीकरण किया जा सके ! चिंताजनक है कि  जिस अनुवाद कर्म को हजारों साल पहले चीन और जापान जैसे देशों द्वारा पांचवी शताब्दी में दुनिया के साहित्यों के लिए इस्तेमाल किया गया उस अनुवाद-कर्म को भारत द्वारा अपने ही बिखरी पड़ी साहित्यिक संपदाओं को सहेजने के लिए अभी तक प्रयोग नहीं किया जा रहा है  ! हालाकि इस दिशा में केंद्रीय ट्रांसलेशन ब्यूरो जैसी सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं मगर अनुवाद में उन्मुक्त रचनाशीलता का अभाव अभी तक बना हुआ है ! साहित्य से सरोकार रखने वाला हर भाषाई जानकार अनुवाद-कर्म की बजाय स्व-सृजन की तरफ भागता नजर आ रहा है ! समकालीन वर्तमान साहित्यकारों में सृजनशीलता के अनुपात में अनुवाद-कर्म के प्रति आकर्षण बहुत कम देखने को मिल रहा है !