| होते रहें ऐसे आयोजन |
| पांच जनवरी से 20 जनवरी तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्वाधान में चलने वाले भारतीय रंग महोत्सव ने दिल्ली के कल्चरल स्पॉट वाले मंडी हाउस इलाके को अपने रंग में रंग लिया था। कला और संस्कृति के नजरिये से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव को कला व संस्कृति प्रेमियों का त्योहार कहना अतिशयोक्ति न होगी। यह महोत्सव अपनी सांस्कृतिक एवं कला पक्ष की विविधताओं को लेकर खासा चर्चित रहा है ! इस बार देश-विदेश के तमाम थियेटर कलाकारों के समूहों द्वारा नाटकों के साथ-साथ नृत्य प्रस्तुति के बेजोड़ रंग ने एक तरफ जहां महोत्सव के कला पक्ष को पुष्ट किया वहीं दूसरी तरफ विद्यालय प्रांगण में सजाये गए मनमोहक टेंट ने भी दशर्कों व सैलानियों का मन मोहा। विविधताओं के रंग में रंगे एनएस डी प्रांगण का अनोखा टेंट पूरे महोत्सव के दौरान अपनी साज-सज्जा को लेकर खास आकर्षण का केन्द्र बना रहा! आंतरिक साज- सज्जा के नजरिये से अगर उस वातावरण का अनुभव किया जाए तो बांस की बल्लियों पर टिके टेंट के अंदर उठने-बैठने व खाने पीने के पारंपरिक इंतजाम थे। पूरे रंग महोत्सव में आकर्षण का केन्द्र बना रहा यह टेंट एक तरह का रंगमंच ही नजर आ रहा था। छोटे से क्षेत्रफल में फैले इस तम्बू को आपवाद मान लिया जाए तो शहरी चकाचौंध में जगमगाती दिल्ली में शायद ही कोई ऐसी जगह हो, जहां बांस के मचान और बांस की सीढ़ियों पर बैठ कर चाय की चुस्की का आनंद लिया जाना संभव हो। दिल्ली की कड़कडाती ठंड में देसी खाट पर बैठे लोगों को कोयले की अंगीठी पर हाथ सेंकते यहां के अलावा इस मेट्रो सिटी में भला और कहां देखा जा सकता था? शहर और गांव की संस्कृतियों का संतुलित और भव्य समन्वय प्रस्तुत करता यह टेंट प्रांगण में मधुर ध्वनि में बज रहे संगीत के बीच दशर्कों के लिए किसी रंगमंच से कम प्रतीत नहीं हो रहा था। प्रांगण की सुंदरता के अलावा रंग महोत्सव के कला पक्ष पर नजर डालें तो कला की विविधताओं की अद्भुत मिसाल देखने को मिली है। देश-विदेश की अलग-अलग भाषाओं में कुल सत्तासी नाटकों का मंचन नामचीन थियेटर समूहों द्वारा किया गया। महोत्सव में जिन नाटकों का मंचन तय था, कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी का सफलता पूर्वक मंचन किया गया। जिनका मंचन तय किये जाने के बाद रद्द किया गया उनमें पाकिस्तान के ओजोक थियेटर का नाटक ‘कौन है ये गुस्ताख’ खासा र्चचा में रहा! ओजोक थियेटर की निर्देशक मदीहा गौहर ने बताया कि भारत-पाक सीमा पर हुए तनाव का खमियाजा उनके नाट्य समूह को भुगतना पड़ा जबकि उनका थियेटर समूह पाकिस्तानी चरमपंथियों के विरोध को खारिज करते हुए महोत्सव में हिस्सा लेने हिन्दुस्तान आया था। हालांकि कला और रंगमंच के इस महोत्सव में कलाप्रेमियों का वह जुनून भी देखने को मिला जिसने साबित कर दिखाया कि कला को भूगोल के दायरे में नहीं बांधा जा सकता है। वह उन्मुक्त हवा की तरह बहने वाली संस्कृति है। जब देश के राजनीतिक हालात एनएसडी की ओर से उक्त नाटक को प्रदर्शित होने की इजाजत नहीं दे रहे थे, ठीक उसी समय कला प्रेमियों के एक समूह ने निजी खर्चे पर ओजोक थियेटर को मंच दिलाकर “कौन है यह गुस्ताख” का मंचन संभव कराया! नाटक के मंचन के बाद मदीहा गौहर मंच पर यह कहते हुए रो पड़ीं कि इतना प्यार सिर्फ हिन्दुस्तान में ही मिल सकता है। अपनी ऑनलाइन टिकट बुकिंग पण्राली के कारण समारोह काफी हाईटेक भी रहा।पूरे आयोजन को कला व संस्कृति का सामाजिक संगम कहा जाना उचित प्रतीत होता है! ऐसे आयोजनों के माध्यम से न सिर्फ इस कला की संस्कृति को जीवित रखा जा रहा है बल्कि जड़वत पड़े सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी एक रफ्तार मिल रही है। दिल्ली व जयपुर जैसे शहरों की तर्ज पर अन्य छोटे बड़े शहरों में भी ऐसे आयोजन किये जाने चाहिए! जैसे-जैसे हम इस संस्कृति को आगे बढ़ाते जाएंगे, कला के प्रति हमारी समझ बढ़ती जाएगी। आज सिनेमा के बिगड़ते स्वरूप की वजह भी शायद यही है कि हमारा सिनेमा रंगमंच की नहीं, बल्कि व्यापार की बुनियाद पर खड़ा है। हमें याद रखना होगा कि रंगमंच ने शुरु आती दिनों में सिनेमा को बहुत कुछ दिया है। अत: सिनेमा की गुणवत्ता बचाने के लिए भी रंगमंच का ही रास्ता अख्तियार करना होगा। यानी इस तरह के रंग महोत्सवों का आयोजन होते रहने चाहिए। शिवानन्द द्विवेदी सहर |
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रविवार, 27 जनवरी 2013
होते रहें ऐसे आयोजन : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख
सेहत के मोर्चे पर पिछड़ता देश : अमर उजाला में प्रकाशित
मानव जीवन के लिए स्वास्थ्य को निर्विवाद तौर पर स्वीकार किया जाता रहा है! स्वास्थ्य का सरोकार महज एक व्यक्ति से नहीं होता, बल्कि राष्ट्र व समाज पर भी उसका व्यापक प्रभाव पड़ता है! स्वस्थ व्यक्ति से ही स्वस्थ समाज का निर्माण होता है एवं स्वस्थ समाज में ही समृद्ध राष्ट्र की बुनियाद निहित होती है! लेकिन हमारी सरकारें स्वास्थ्य से जुड़ी मूलभूत जरूरतें पूरी करने में विफल रही हैं। चाहे स्वास्थ्य के नाम पर दिया जाने वाला हमारा सालाना बजट हो या प्रत्येक साल जानलेवा बनने वाली मौसमी बीमारियों पर नियंत्रण कर पाने में सफलता का आंकड़ा, हर मोर्चे पर हम अन्य देशों के मुकाबले पिछड़ते नजर आते हैं। आंकड़ों पर गौर करें, तो एनीमिया और डायरिया जैसी बीमारियों से मरने वालों की संख्या हमारे देश में सबसे ज्यादा है। बेशक पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी पर नियंत्रण पाने में हम काफी हद तक सफल रहे हैं, लेकिन आज भी स्वास्थ्य से जुड़े तमाम ऐसे मसले हैं, जो हमें शर्मसार करते हैं।
बुनियादी तौर पर अगर स्वास्थ्य के प्रति संवेदनहीनता या व्यवस्थागत लापरवाही को खंगालें, तो हमारी स्वास्थ्य नीतियों में वे तमाम खामियां नजर आएंगी, जिन्हें बदहाली के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। दुख की बात है कि स्वास्थ्य से जुड़े मामले को बाजार के हाथों सौंपा जा रहा है। स्वास्थ्य से जुड़ी मूलभूत जरूरतों में चिकित्सालय, चिकित्सक एवं दवाइयों को रखा जाता है! एक सर्वे के अनुसार, हमारे देश में मरीजों द्वारा स्वास्थ्य पर किए जाने वाले कुल व्यय का 70 प्रतिशत हिस्सा दवाइयों पर खर्च होता है, जबकि मात्र तीस प्रतिशत अन्य संसाधनों आदि पर! लेकिन दवाइयों को लेकर हमारी सरकार का रवैया बेहद आश्चर्यजनक एवं निराशापूर्ण है! अब तक लागू दवा नीति के अनुसार, मात्र चौहत्तर दवाओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार सरकार के पास है, जबकि अन्य सभी जरूरी दवाओं का मूल्य निर्धारण दवा निर्माता कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से किया जाता रहा है! सरकार के नियंत्रण से मुक्त ये दवा निर्माता कंपनियां अपनी मर्जी से मूल्य निर्धारण कर मुनाफा कमा रही हैं, जबकि गरीब लोग महंगी दवाओं के चलते इलाज करा पाने अक्षम साबित हो रहे हैं। हालांकि नई दवा नीति, 2012 के तहत कुल 348 दवाओं के नए ढंग से मूल्य निर्धारण को मंजूरी दे दी गई है, जिस पर शीघ्र ही अधिसूचना जारी होगी, लेकिन सवाल उठता है कि आखिर दवा जैसी मूलभूत चिकित्सकीय सामग्री को लेकर सरकार इतनी संवेदनहीन और लाचार क्यों है। वह स्वयं लागत के आधार पर दवाओं का मूल्य निर्धारित क्यों नहीं करती! आज देश में दवाओं का कारोबार जहां हजारों करोड़ का है, वहीं सरकारी दवा कंपनियों का कुल सालाना कारोबार मात्र पांच सौ करोड़ का, यह आंकड़ा भी स्वास्थ्य के प्रति सरकारी तंत्र की संजीदगी पर सवाल खड़े करता है।
हर वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में मौसमी बुखारों से भारी संख्या में लोग मरते हैं! उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मंडल में दिमागी बुखार या दिल्ली में डेंगू के प्रकोप के चलते हजारों लोग हर वर्ष मर जाते हैं। बावजूद इसके आज तक इनके नियंत्रण के उपायों पर कोई ठोस कार्य नहीं किया जा सका है। यह चिकित्सा बाजार द्वारा फैलाया भ्रम नहीं तो और क्या है कि जिन छोटी बीमारियों से लाखों लोग मरते हैं, उन्हें महामारी या आपदा घोषित कर उसका समाधान मुआवजे से किया जाता है, जबकि एड्स से कम लोगों के मरने के बावजूद उससे जुड़े अनुसंधानों पर कई गुना राशि खर्च की जाती है। सरकार द्वारा चिकित्सालय बनवाने की बातें तो अक्सर होती हैं, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर सरकारी दवा दुकान उपलब्ध कराने की दिशा में खास कोशिश नहीं दिखती है। स्वास्थ्य सेवा आज निजी क्षेत्र के हवाले हो चुका है, जिस पर नियंत्रण की जरूरत है। सरकार को उचित दरों पर दवाइयों की दुकानें उपलब्ध करवाने पर गंभीरता से सोचना चाहिए, और प्रति हजार जनसंख्या पर एक डॉक्टर उपलब्ध कराना चाहिए, अन्यथा निजी क्षेत्र के व्यवसायी यों ही मरीजों को लूटते रहेंगे।
हर वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में मौसमी बुखार से हजारों लोग मरते हैं, पर उनकी रोकथाम के लिए ठोस कदम नहीं उठाया जाता।
शिवानन्द द्विवेदी सहर
रविवार, 20 जनवरी 2013
गुलजार में हैं ना जाने कितने गुलजार : मुलाक़ात के आईने से
इन्डियन हेबिटेट सेंटर में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में आये गुलजार से हुई एक मुलाक़ात के बाद लिखा गया यह पोस्ट : मुलाक़ात के बाद
इन्डियन हेबिटेट सेंटर दिल्ली में विनोद खेतान की “पुस्तक उम्र से लंबी सडको पर गुलजार” का विमोचन करने आये गुलजार को सुनने एवं उनसे निजी तौर पर मिलने का अवसर मिला ! गुलजार से मिलना दूर से जितना दुष्कर लगता है पास से उतना ही सरल है , और गुलजार भी दूर से जितने खास दिखते हैं आम लोगों के बीच आकर उतने आम हो जाते हैं ! डा. विनोद खेतान की यह किताब गुलजार के चुनिन्दा नज्मो और गीतों के संकलन एवं समीक्षा पर आधारित है ! हालाकि इस किताब में समीक्षा या आलोचना से ज्यादा लेखक की व्यक्तिगत टिप्पणियाँ ज्यादा नजर आती हैं ! शाम साढे छ: बजे इन्डियन हेबिटेट सेंटर में आयोजित इस पुस्तक विमोचन समारोह में गुलजार के अलावा कई ख्यातिलब्ध हस्तियाँ मौजूद रही ! प्रमुख वक्ता के तौर पर प्रख्यात साहित्यकार केदारनाथ सिंह एवं जनसत्ता के प्रधान संपादक ओम थानवी सहित सुकृता पाल आदि मौजूद रहे ! पुस्तक विमोचन की पारम्परिक औपचारिकताओं के बाद वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला ! पुस्तक एवं गुलजार पर प्रकाश डालते हुए ओम थानवी ने कई ऐसे सवाल उठाये जो वाकई फिल्म जगत में एक लेखक के लिए चुनौती के रूप में कायम हैं ! गुलजार के लेखन के तमाम नए पुराने उदाहरणों को याद करते हुए ओम थानवी ने उन गीतों का भी जिक्र किया जो गुलजार के व्यक्तित्व से ज्यादा सिनेमा के बाजार को सूट करने वाले हैं ! इसमे कोई दो राय नहीं कि सिनेमा बाजार की अपेक्षाओं से गुलजार भी अछूते नहीं रहे हैं और उनके द्वारा भी ऐसे तमाम गीत लिखे गए हैं जिनको लेकर गुलज़ार की जम कर आलोचना हो सकती है या होती भी रही है ! हालाकि गुलजार के तमाम अच्छे और दिल को छूने वाले नज्मो का जिक्र करना भी ओम थानवी नहीं भूले ! गुलज़ार के द्वारा लिखी गयी एक प्रार्थना “हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए” का जिक्र करते हुए प्रख्यात साहित्यकार केदार नाथ सिंह ने कहा कि यह प्रार्थना पूर्वांचल के हर विद्द्यालय में गाई जाती है लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि इस प्रार्थना के रचयिता कौन है ! बकौल केदार नाथ सिंह “जब रचना इतनी मशहूर और जन-जन की कंठ पर बसने वाली हो जाय कि लोग लेखक का नाम भुल जाए तो समझिए कि यह उस लेखक द्वारा किया गया सर्वश्रेष्ठ सृजन है ! केदारनाथ सिंह के इस वाक्यांश को संदर्भ में रखकर अगर देखा जाय तो प्रतीत होता है कि सदी के महान गीतकार गुलजार की तमाम कृतियाँ गुलजार से भी बड़ी और गुलजार से भी महान हो चुकी हैं !
पुरे कार्यक्रम के अगर गुलज़ार को लेकर मै अपना नजरिया रखूं तो वाकई गुलजार महज एक गुलजार नहीं दिखते बल्कि उनके भीतर ना जाने कितने जाने-पहचाने या अनजाने गुलजार दिखते है जो आपको यत्र-तत्र कहीं भी दिख जायेंगे ! “दिल वालों के दिल का करार लूटने” वाले गुलजार अपने गीतों में सभी भाषाओं के शब्दों को डाल कर साहित्य और भाषा की विविधताओं का ऐसा घोल तैयार कर लेते हैं जो हर श्रोता के लिए मीठा एवं सुपाच्य बन जाता है ! चाहें आधुनिक वातावरण के अनुकूल गीत लिखना हो या पारम्परिक उर्दू का शायराना अंदाज हो ,गुलजार बस गुलज़ार करते नजर आते हैं ! हालाकि इस मसले पर बोलते हुए गुलजार खुद को अदना बताते हैं और बड़ी मासूमियत से कह जाते हैं कि शायरी का मिज़ाज तो मैंने शैलेन्द्र और डा.प्रदीप से सीखा है ! गुलजार को इस बात की कसक है कि डा. प्रदीप और शैलेन्द्र पर भी लेखन होना चाहिए ! कार्यक्रम के अंत में जब गुलजार थोड़े खाली नजर आये तो मै उनके पास गया और नमस्कार करते हुए सिर्फ यही कहा कि आपसे मिलकर अच्छा लगा ! जवाब में गुलज़ार ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और जवाब दिया “मुझे भी” ! इसमे कोई दो राय नहीं कि गुलज़ार साहब के रूप में साहित्य,सिनेमा और संगीत जगत को अनोखा उपहार मिला है जिसने अपने कलम से तमाम ऐसे आयाम गढे हैं जो कभी नहीं भुलाए जा सकेंगे ! इस पुरे कार्यक्रम में केदार सिंह को सुनना सबसे रुचिकर रहा तो वहीँ गुलजार द्वारा पेश की गयी दो नज्मो से पूरा आडिटोरियम गुलज़ार हो गया ! फिर चाय कि चुस्की के बाद मै और मेरे मित्र शुक्ला जी गुलजार को दिल में समेटे घर वापस आये !
मुनाफे के बाजार में प्राथमिक शिक्षा : जागरण में प्रकाशित लेख
दैनिक जागरण नेशनल में 18 जनवरी को प्रकाशित.
व्यक्ति और समाज के सार्वभौमिक विकास में प्राथमिक शिक्षा के महत्व को निर्विवाद तौर पर स्वीकार किया जाता रहा है। रोटी, कपड़ा और मकान जैसे मूलभूत जरूरतों के बाद समाज में प्राथमिक शिक्षा की अनिवार्यता को ही सबसे अधिक महत्व प्राप्त है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की अनिवार्यता को समझते हुए भारत सरकार द्वारा कानूनी रूप से प्राथमिक शिक्षा को हर बच्चे के अधिकार के तौर पर परिभाषित किया जा चुका है। इसी शिक्षा के अधिकार कानून के तहत छह साल से 14 साल तक के हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार कानून द्वारा दिया गया है। सैद्धांतिक तौर पर बेशक हम शिक्षा के नाम पर इतना ठोस और कानूनी कदम उठा चुके हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर अब भी प्राथमिक शिक्षा को सहज, सुलभ एवं सुनिश्चित कर पाने में नाकामयाब ही साबित हो रहे हैं। दुर्व्यवस्था के शिकार सरकारी प्राथमिक शिक्षण संस्थानों से तो अभिभावकों का मोह भंग बहुत पहले ही हो चुका है और अधिकांश मध्यमवर्गीय अभिभावक निजी शिक्षण संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे हालात में जब निजी शिक्षण संस्थानों में बच्चों का दाखिला कराने के सिवा अभिभावकों के पास कोई और चारा नहीं दिख रहा है तो शिक्षण संस्थान भी दाखिले से लेकर पढ़ाई तक में मनमाना रुख अख्तियार करते नजर आ रहे हैं। निजी संस्थानों की मनमानी का आलम यह है कि अभिभावकों के लिए नर्सरी क्लास में भी अपने बच्चों का दाखिला करा पाना मील का पत्थर साबित हो रहा है। नर्सरी क्लास में दाखिले को लेकर वर्ष 1999 में शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी किए गए सर्कुलर को ताक पर रखकर निजी संस्थानों द्वारा जिस तरह से मनमाने नियमों के तहत दाखिला दिया जा रहा है, वह बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावकों के लिए भी परेशानी का सबब बना हुआ है। प्रास्पेक्टस शुल्क, अधिकतम आयु सीमा, अभिभावक की आय, विद्यालय से बच्चे के आवास की दूरी जैसे बिंदुओं पर शिक्षा निदेशालय द्वारा तय किए गए मानकों एवं निर्देशों को निजी संस्थान दशकों से धता बताकर अपने मुनाफे के हिसाब से नियम बनाते आ रहे हैं। मासूमों के भविष्य और अभिभावकों की दिक्कतों से बेपरवाह ये संस्थानों शिक्षा का जिस तरह से धड़ल्ले से बाजारीकरण कर रहे हैं, वह भारतीय शिक्षा के भविष्य के लिए बेहद घातक परिणाम ला सकता है। नर्सरी क्लास में बच्चों के दाखिले को लेकर प्वाइंट सिस्टम में अलग-अलग विद्यालय अलग-अलग मानकों के आधार पर भेदभावपूर्ण रवैया अपना रहे हैं। यह भी शिक्षा प्रणाली के लिए चिंताजनक है। प्वाइंट सिस्टम को अभिभावक के पद, आय आदि के अनुमानित आकलन के आधार पर आवंटित करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित और न्यायसंगत नहीं है। हालांकि शिक्षा निदेशालय द्वारा हर विद्यालय को अपना दाखिला मानक बनाने की छूट जरूर दी गई है, लेकिन इस छूट का कतई यह मतलब नहीं होना चाहिए कि प्वाइंट सिस्टम में ही पद, आय आदि के आधार पर बच्चों के साथ भेदभाव किया जाए। इस संदर्भ में शिक्षा निदेशालय को चाहिए कि वह निजी संस्थानों को दी गई इस छूट में थोड़ी सख्ती लाकर इसके दायरों को और स्पष्ट करे, जिससे निजी संस्थान दाखिले की मूल प्रक्रिया में ज्यादा मनमानी कर पाने को स्वतंत्र न हो सकें। इस संदर्भ में हमें इस बात को समझना होगा कि शिक्षा हमारे समाज की जरूरत है। इसे महज एक बच्चे की निजी जरूरत समझना हमारे वर्तमान समाज एवं व्यवस्था की सबसे बड़ी भूल साबित होगी। लिहाजा, प्रत्येक बच्चे को प्राथमिक स्तर पर शिक्षित बनाने का दायित्व भी इन संस्थानों का है। दाखिले की इस प्रक्रिया में अभिभावकों की शैक्षिक योग्यता को आधारभूत मानक बनाना भी किसी नजरिये से शिक्षा के मूल सिद्धांतों के अनुकूल नहीं प्रतीत होता है। किसी भी मासूम को शिक्षित बनाने में उसके शिक्षक एवं विद्यालय के शैक्षिक माहौल का बड़ा योगदान होता है, जबकि अभिभावकों की भूमिका अपने बच्चे को आचरण एवं सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाने की होती है। यह कुतर्क किसी भी नजरिये से स्वीकार नहीं किया जा सकता कि बेहतर शिक्षा पर उसी बच्चे का अधिकार है, जिसके अभिभावक पूर्णतया शिक्षित एवं संपन्न हों। शिक्षा के अधिकार के तहत शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हर बच्चे का है और यह अधिकार उसे बिना किसी शर्त के मिलना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती निजी संस्थानों की दखलअंदाजी एवं दाखिले आदि की प्रक्रिया में उनकी मनमानी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यह देश एवं समाज से जुड़ी प्राथमिक स्तर की शिक्षा का मसला है। इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। निजी संस्थानों का शिक्षा के प्रति रवैया बेहद अतार्किक एवं व्यापारोन्मुख है और उनसे किसी भी प्रकार की ऐसी अपेक्षा नहीं रखी जा सकती, जिससे हमारी शिक्षा की बुनियाद मजबूत हो सके। शिक्षा के नाम पर मुनाफे का बाजार खड़ा करते ये निजी शिक्षण संस्थान न तो शिक्षा के प्रति अपनी जवाबदेही जाहिर करते हैं। शिक्षा का बाजार खड़ा करते जा रहे इन संस्थानों के भरोसे देश की शिक्षा की नींव कैसे रखी जा सकती है। शिक्षा के इस बिगड़ते स्वरूप के लिए हमारी सरकार कम जिम्मेदार नहीं है। एक तरफ जहां शिक्षा के अधिकार कानून के तहत हर नौनिहाल को शिक्षा मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया, वहीं इन लक्ष्यों को प्राप्त करने संबंधी कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई। अगर नीति बनाने में थोड़ा-बहुत काम हुआ भी तो उसे अमल में नहीं लाया जा सका। हालांकि दाखिले में निजी संस्थानों के मनमाने रवैये पर आ रही शिकायतों के आधार पर शिक्षा निदेशालय द्वारा कुछ मानक जरूर तय किए गए हैं, लेकिन वास्तविक तौर पर इसे मूल समस्या का समाधान नहीं कहा जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि तमाम निर्देशों के बावजूद निजी संस्थानों की मनमानी चलती रहेगी और मजबूर अभिभावक निजी संस्थानों के दबाव को झेलने को मजबूर होते रहेंगे। ऐसा होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरत को हमारी सरकार द्वारा बिना ठोस नियंत्रण के निजी संस्थानों के हाथों सौपा जा चुका है। सरकार शिक्षा के नाम पर अभियान चलाने, योजना आदि शुरू करने के लिए पैसे पानी की तरह बहा रही है, लेकिन सरकारी संस्थानों में पर्याप्त शिक्षक, बैठने के लिए बेंच, भवन आदि तक का इंतजाम नहीं किया जा रहा है। ऐसे में सरकारी विद्यालयों के प्रति लापरवाह हो चुकी सरकार से मनमाने होते जा रहे इन निजी संस्थानों पर नियंत्रण की उम्मीद करना भी बेमानी नजर आता है। बहरहाल, सवाल वहीं का वहीं बना हुआ है कि क्या शिक्षा को लेकर कोई और विकल्प हो सकता है या दाखिले के नाम पर अभिभावक, नौनिहाल और समाज यों ही ठगे जाते रहेंगे? यह सवाल पूरी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, न कि किसी एक बच्चे के दाखिले मात्र से। शर्तो की बुनियाद पर शिक्षा बांटना शिक्षा के अधिकार का मजाक उड़ाने जैसा ही है और यह मजाक धड़ल्ले से उड़ाया जा रहा है। हम सबके आस-पड़ोस, हर जगह।
शिवानन्द द्विवेदी सहर
शनिवार, 5 जनवरी 2013
स्मृतियों में रूस : दैनिक जागरण में कुछ अंश प्रकाशित
शिखा वार्ष्णेय जी की संस्मरण पुस्तक स्मृतियों में रूस पर मेरे द्वारा लिखी गयी इस प्रतिक्रिया का कुछ अंश 6 जनवरी 2013 के दैनिक जागरण राष्ट्रीय के पेज 9 पर "हिन्दी का महत्व" शीर्षक से प्रकाशित है !
स्मृतियों में रूस हमेशा पाठक की स्मृतियों में उसी तरह बनी रहेगी जिस तरह मानो उसे भूलने की कला आती ही नहीं हो,या भूलने की कला का माहिर खिलाड़ी होते हुए भी हमेशा उसे ना भुल पाने की वजह ढूंढता फिरता हो ! पाठक मन यत्र-तत्र लिखता-पढ़ता हुआ, कुछ खोजता सा, कुछ गढता सा भटकता रह जाता है कि स्मृतियों में रूस में आखिर ऐसा क्या है कि पाठक की स्मृति में यह संस्मरण पुस्तक हमेशा बनी रहती है !लन्दन में रह रहीं लेखिका शिखा वार्ष्णेय जी की संस्मरण पुस्तक “स्मृतियों में रूस” मुझे मेरे दफ्तर के पते पर पहुचने के दो दिन बाद मिली, क्योंकि मै अवकाश पर था ! पुस्तक मिलने के उपरान्त एक सरसरी निगाह डालना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है बेशक पाठक द्वारा वो विस्तार से बाद में पढ़ी जाय ! मैंने भी दफ्तर में ही सरसरी निगाह से एकाध पन्ने पलटना शुरू किया, लेकिन एक एक पंक्तियाँ एक के बाद एक कुछ यूँ कड़ियों में जुडती गयीं कि मेरा पाठक मन पंक्तियो,अवतरणों और अध्यायों के बनाये साहित्य जाल में पूरी तरह नतमस्तक हो चुका था ! पंक्ति दर पंक्ति आगे बढ़ने और हर पंक्ति को जल्दी पढ़ लेने की होड़ ने मेरे मन को बिना पूरा पढ़े रुक जाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया ! साहित्य और शब्दों की क़ैद में कैदी बन जाने का अनुभव बहुत कम मिलता है, इसलिए मै उस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था ! शब्द बांधे जा रहे थे और मेरा पाठक मन बंधा जा रहा था !
एक भारतीय परम्परा और आदर्श संस्कृति में पली बढ़ी लड़की का घर से पराये देश अध्यन करने हेतु जाते समय उत्पन्न हुई पारिवारिक मनोदशा एवं परिजनों की चिंता का बड़ा ही व्यवहारिक पक्ष पुस्तक के प्रथम अध्याय “दोपहर और नई सुबह” में देखने को मिलता है ! माँ की स्वाभाविक चिंताएं और पिता का पुत्री के प्रति खुद को संतोष दिलाने वाला वो आत्मविश्वास एवं आभासी परिणामों के प्रति परिजनों को होने वाली चिंताओं का सुंदर समन्वय भी इसी अंश में खुल कर मुखरित हुआ है ! इन्ही चिंताओं को शब्दों में उकेरते हुए लेखिका लिखती हैं “ अब जब अचानक मेरा चयन रूस जाने के लिए हो चुका था तो ये समझ नहीं पा रही थी कि खुश होऊं,डरूं या फिर...अजीब मनोदशा !” लेखिका के ये शब्द एक तरफ जहाँ प्रेम,विछोह और परिजनों की चिंता को बखूबी प्रस्तुत करते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ इन्ही शब्दों में भारतीय परिवारों के रुढियों एवं रुढियों से लड़ने सहित तमाम मनोभावों के भी दर्शन होते है ! लेखिका के इस डर में एक तरफ जहाँ भारतीय समाज की रूढियां उभर कर सामने आती हैं तो वहीँ रूस जाने के फैसले पर कायम रहना इन रुढियों को झुठलाने के साहस को दिखाता है !
पुस्तक के अगले अध्याय का सबेरा हमें रूस की चाय के साथ देखने को मिलता है जहाँ भौगोलिक विषमताओं में भाषाई समस्या का बड़ा ही पुष्ट उदाहरण लेखिका के संस्मरण का हिस्सा बन जाता है ! चाय को रूस में भी चाय ही बोलते हैं यह बात शायद बहुत कम लोगों को पता हो ! भाषाओं को लेकर हमारे मन में कोई पूर्वाग्रह का भाव होता है या भाषाई विषमता का असर कि लेखिका एवं उनके मित्रों द्वारा रूस में चाय को हर उस नाम से माँगा जाता है जिसे रूसी वेटर नहीं समझ पाती ! लेकिन जैसे ही लेखिका के मित्र द्वारा झुंझलाते हुए यह कहा जाता है कि “चाय दे दे मेरी माँ”......वेटर तुरंत समझ जाती है ! भाषा के दृष्टिकोण से मेरे मन में यहाँ एक अतिरिक्त सवाल यह उठता है कि चाय शब्द भारत से रूस गया है या रूस से भारत आया ? खैर, इसे तमाम विषमताओं के बीच की भाषाई समानता ही कह सकते हैं जो कि विश्व के दो अलग-अलग संस्कृतियों को जोड़ने का काम चाय जैसे शब्द द्वारा संभव हो पाता है !
संस्मरण की स्मृति यात्रा पर निकलीं लेखिका, रूस के एक शहर वोरोनिश को करीब से टटोलते हुए उसमे अपने गृह नगर कानपुर को तलाश लेती हैं !व्यावहारिकता का एक सबसे बेहतर चरित्र यह है कि दूर दराज में जहाँ हमे हमारे अपने कम ही मिलते हैं तो हम तमाम विषमताओं को दरकिनार कर छोटी-छोटी समानताओं में अपनापन ढूढ लेते है ! इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रूस जैसे देश में भी लेखिका ने एक कानपुर ढूढ लिया ! प्राथमिक स्तर पर भाषाई विषमता की समस्या के चलते लेखिका को एक तरफ जहाँ भाषा की दिक्क्त का सामना करना पड़ रहा था तो वहीँ दुभाषिये की जरुरत कदम कदम पर पड़ रही थी ! शायद अंतर्राष्ट्रीय भाषा के नाम से जानी जाने वाली अंग्रेजी अभी वहाँ अपना वजूद नहीं बना पाई थी ! हालाकि लेखिका ने इस पुस्तक में इस बात का जिक्र किया है कि व्यक्ति के नामो का सरलीकरण भारत जैसे ही रूस में भी कर लिया जाता है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि लेखिका के लिए यह शायद मुश्किल भरा किन्तु एतिहासिक दौर था क्योंकि वो नब्बे का शुरुआती दशक था जब वो जब रूस प्रवास पर थी और उसी दौरान रूस में आंतरिक हालात भी बहुत बिगडने लगे थे! आर्थिक हालात चरमरा गए थे ,अमेरिकी प्रभाव कायम होने लगा था और सोबियत टूट रहा था ! तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर आज मै यही कह सकता हूँ कि उन विषम परिस्थितियों का गवाह बनना लेखिका के लिए एक साहसिक ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक स्मृति के रूप में भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा ! लेखिका द्वारा लिखे गए संस्मरण में तत्कालीन परिस्थितियों में आर्थिक तंगी से जूझते रूस और बदहाल देश का चित्रण भी बखूबी देखने को मिलता है !रूस के उन तत्कालीन बदलावों को भी लेखिका की कलम ने बड़ी बारीकी से रेखांकित किया है और लेखिका के इसी रेखांकन ने साहित्य के संस्मरण विधा की इस कृति को अत्यधिक प्रभावशाली बनाता बनाने का काम किया है ! इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संस्कार और संस्कृति के साथ-साथ देशकाल और वातावरण तक को लेखिका द्वारा शब्दों में सहेजने का सफल प्रयास किया गया है और इस बात के प्रति खास ख्याल रखा गया है कि संस्मरण के हर संभव दृश्य को कागजों पर बखूबी गढा जा सके !इस पुस्तक के माध्यम से रूस के कल पक्ष पर नजर डालने पर ऐसा प्रतीत होता है कि फिल्मो के मामले में भारतीय कलाकारों की फिल्मे उस दौर में भी वहाँ खूब प्रचलित थी और देखी जाती थी ! रूस के नागरिक शायद हमारी अपेक्षा ज्यादा कलाप्रेमी हैं यही कारण है कि वहाँ हिन्दी फिल्मे भी प्रचलित रहीं हैं ! पुरे संस्मरण में कई बार ऐसा भी समय आया जब लेखिका को अपने भारतीय संस्कृति के मूल्यों से समझौता करने की मजबूरियों का भी प्रस्ताव आया ! शायद इसी अनुभव को साझा करते हुए लेखिका ने जिक्र किया है कि वहाँ हर मर्ज के इलाज के रूप में वोदका का सुझाव आम था ! खाने पीने और नाचने में खुशी तलाशने का रुसी फार्मूला अब भारत में भी आम हो चुका है लेकिन रूस इसे किस नजरिये से समझता है ,यह कहना मुश्किल है ! जिस वोदका को ना लेने की मजबूरियां भारतीयों को आसानी से समझाई जा सकती थी उन्ही मजबूरियों और कारणों को रुसी मित्रों को समझाना उतना ही मुश्किल हो जाता था ! मांस वहाँ खूब प्रचलित था ! रूस में पढ़ाई के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन में हाथ लगाने और अखबारों में प्रकाशित लेखों का जिक्र भी लेखिका के संस्मरण से अछूता नहीं रहा है ! रूस की राजधानी मास्को की सुंदरता और वहाँ के संसकृति ,संगीत ,संगीत प्रेमियों ,नृत्य कला आदि को भी लेखिका के कलम की बारीक निगाहों ने करीब से पढ़ा है जो इस पुस्तक को सीधे रूस से जोडने का काम करती है !लेखिका की कलम रूस के ऐतिहासिक तथ्यों को समझते और जिक्र करते हुए टालस्टाय और चेखव की कहानियों में भारत दर्शन को भी तलाशती हैं ,जहाँ उन्हें गाँधी और अहिंसा के प्रभाव् का दर्शन होता है !
अपने हर घड़ी और हर पल में रूस को समझने की कोशिश करती यह भारतीय लेखिका अपने अनुभव को जहाँ विराम देती है वहीँ से पाठक का मन रूस को निहारने पर विवश होता है ! लेखिका ना तो वहाँ की बबुश्का को भूली हैं, ना ही वहाँ की चाय को और ना ही उन दोस्तों सहेलियों को जो शौक से भारतीय साडियां पहन लेती थीं ! इस संस्मरण पुस्तक में अनुभवों,तथ्यों और चित्रों का शानदार समन्वय जिस तरह से लेखिका द्वारा प्रस्तुत किया गया है ,पाठक हमेशा शिकायत करेगा लेखिका से कि थोड़ा और होता तो कितना अच्छा होता ! बेस्वाद पड़े सफ़ेद पन्नों पर रूस का स्वाद लेखिका ने अपनी कलम से कुछ यूँ विखेरा है कागज के बने मुर्दा पन्ने हर बार जी उठते हैं और पाठक के मन एक रूस बनकर घुस जाते हैं ! हर वो व्यक्ति जो शायद रूस ना जा पाए एक बार इन पन्नों को निहार ले शायद एक रूस उस तक चलकर खुद आ जाए ! अंत में मै एक पाठक की प्रतिक्रिया के तौर पर यही कहूँगा कि इस दुनिया में दो रूस बसते हैं एक ,जो एशिया और यूरोप के भूभाग पर तो दूसरा “स्मृतियों में रूस के इन पचहत्तर पन्नों में”....! धन्यवाद
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