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गुरुवार, 21 मार्च 2013
पानी को लेकर इतनी लापरवाही क्यों : नई दुनिया राष्ट्रीय में मेरा सम्पादकीय लेख
22 मार्च-13
समूची दुनिया में प्राणीमात्र की तमाम मूलभूत जरुरतों में जल की अनिवार्यता सबसे महत्वपूर्ण मानी गयी है ! शायद इसीलिए जल को जीवन से सीधे तौर पर जोड़ कर देखा जाता रहा है ! समूचे ब्रह्माण्ड में वैज्ञानिकों द्वारा जहाँ भी जीवन की संभावनाओं को तलाशने का प्रयास किया जाता है वहाँ सबसे पहले जल और ऑक्सीजन के अस्तित्व को खोजने की बात की जाती रही है ! जीवन के लिए धरती को सबसे अनुकूल माने जाने के पीछे की महत्वपूर्ण वजह यह है कि यहाँ जल की कोई कमी नहीं है और पूरी दुनिया का लगभग तीन हिस्सा जल ही जल है ! भौगोलिक दृष्टिकोण से बेशक धरती पर जल का अपार भण्डार है मगर इसका कतई ये मतलब नहीं है कि समूचे जलीय हिस्से को जीवनोपयोगी मान लिया जाय !तमाम परीक्षणों में यह स्वीकार किया गया है कि धरती पर मौजूद लगभग डेढ़ घन किमी जल का मात्र २.७ प्रतिशत जल ही स्वच्छ एवं उपयोगी है और इतने ही जल का उपयोग मानव जीवन से जुड़ी तमाम प्राथमिक जरूरतों की पूर्ति के लिए किया जा सकता है ! जीवनोपयोगी जल की मात्रा सीमित होने के कारण जल संरक्षण को लेकर हमेशा से चिंता जताई जाती रही है !चुकि मानव को जल का सबसे बड़ा उपभोक्ता माना गया है अत: बेलगाम होती विश्व की जनसँख्या का जल की मात्रा पर पडने वाला प्रभाव एवं जनसँख्या के अनुपात में असंतुलित होती जल आपूर्ति,को लेकर भी हमेशा से तमाम भू-शास्त्रियों द्वारा चिंता जताई जाती रही है ! भू-जलस्तर में गिरावट एवं जल-प्रदूषण के साथ-साथ जल की मात्रा में लागातार हो रही कमी आदि को लेकर जिस तरह का अंदेशा पिछले दिनों तमाम भू-वैज्ञानिकों एवं संगठनो द्वारा जताया गया वो कहीं ना कहीं पर्यावरण एवं जीवन के लिए चिंता का विषय है ! भारत के संदर्भ में अगर जल संकट के वर्तमान दृश्यों को आंकड़ों के ग्राफ पर समझने का प्रयास करें तो स्थिति बड़ी ही दयनीय और चिंताजनक नजर आती है ! वर्तमान में देश का कोई भी विकास खण्ड भूजल के दृष्टिकोण से पूर्णतया सुरक्षित नहीं है और लगभग दो लाख से ज्यादा गाँवों में भूजल के स्तर में लागातार गिरावट को देखा गया है ! आजादी के समय यह आंकड़ा महज कुछ हज़ारों में था लेकिन आज यह लाखों में पहुचने लगा है ! पिछले दो दशकों में लगभग ढाई सौ से ज्यादा जिलों में भू-जलस्तर में चार से छ: मीटर की गिरावट हुई है जो गांवों और पिछड़े इलाको के लिए अत्यंत ही चिंता जनक है ! देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या इस तरह की है कि वहाँ पानी बेचने की वजह से जलस्तर २० से ३० मीटर तक गिर चुका है !गिरते जलस्तर के परिप्रेक्ष्य में अगर भारत की राजधानी सहित अन्य महानगरों की स्थिति देखे तो मामला अत्यंत ही चिंता जनक नजर आता है ! नॅशनल जियोफिसिकल रिसर्च इंस्टिटयुट द्वारा जारी एक रिपोर्ट में ऐसा बताया गया कि दिल्ली,चेन्नई,मुम्बई में भू-जलस्तर लागातार तेजी से गिर रहा है जबकि हैदराबाद की स्थिति और भी नाजुक होती जा रही है ! भारत में बढ़ती जनसंख्या और जल उपलब्धता के बीच लागातार बढ़ रहे असंतुलन को समझने के लिए ये आंकड़े ही पर्याप्त हैं जिसमे बताया गया है कि जल की उपलब्धता जो पचास के दशक में ५००० घन मीटर प्रति व्यक्ति थी आज १६३२ घन मीटर प्रति व्यक्ति पर आ गयी है ! प्रति व्यक्ति जल के अनुपात में हुई ये गिरावट इस बात की पुष्टि करती है कि हम किस रफ़्तार से जल का क्षय कर रहे हैं !
जल की कमी के साथ साथ दूसरा बड़ा संकट जल-प्रदुषण का है ! जल-प्रदूषण का आलम यह है कि दुनिया के हर छठे व्यक्ति को स्वच्छ पानी तक मयस्सर नहीं है और उसे दैनिक जीवन में प्रदूषित जल का उपयोग करना पड़ रहा है ! एक आंकड़े में बताया गया है कि दुनिया के आधे बीमार लोग जल जनित बीमारियों के शिकार हैं ! अकेले भारत की लगभग ८०% बीमारियों के लिए प्रदूषित जल को वजह माना जाता है ! प्रदूषित होते इस जल संकट का कुप्रभाव मानवों के साथ-साथ जीव-जंतुओं एवं नदियों पर भी व्यापक रूप से पड़ा है ! प्रदूषित जल संकट का ही परिणाम है कि सैकड़ों नदिया बुरी तरह से प्रदूषित होकर समाप्त होने की कागार पर हैं एवं तमाम बीमारियों की वजह बनती जा रही हैं ! मछलियों एवं जलीय जंतुओं की तमाम प्रजातियां तो प्रदूषण के दंश का शिकार होकर समाप्त हो चुकी हैं और कुछ समाप्त होने की कगार पर हैं !जल प्रदूषण के बढते कुप्रभाव ने ना सिर्फ पर्यावरण में जैविक क्षय की स्थिति उत्पन्न की है बल्कि पर्यावरण की धरोहरों को क्षति पहुचाने का काम किया है !यमुना जैसी नदियों में बढ़ता प्रदूषण कहीं ना कहीं पर्यावरणीय धरोहरों के लिए खतरे की घंटी होने के साथ-साथ तटीय शहरी इलाको में बीमारियों का कारण बनती जा रही हैं !
जल संरक्षण के बुनियादी तौर-तरीकों का अभाव एवं जनसंख्या के अनुपात में जल की मात्रा में लागातार हो रही कमी से लेकर जल-प्रदूषण और भू-जलस्तर में गिरावट के प्रति हम जिस तरह से लापरवाह होते जा रहे है वो भविष्य में समूची दुनिया के लिए घातक साबित हो सकता है ! सवाल ये है कि जल जैसी प्राथमिक जरुरत को लेकर हम इतने संवेदनहीन क्यों होते जा रहे हैं ? जिस पानी से हमारा पर्यावरण और हम सभी संचालित है उस पानी को लेकर आखिर हमारे इस बेपानी होते रवैये की वजह क्या है ? दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धरते जा रहे इस जल संकट से निजात पाने के लिए हमें कई बिंदुओं पर ठोस उपाय करने की जरुरत है ! सबसे पहले तो हमें जल को संरक्षित करने के उपायों पर बल देना होगा ! हालाकि घनी होती देश की आबादी जल संरक्षण में सबसे बड़ी बाधक साबित हो रही है बावजूद इसके हमें वृक्षारोपण एवं भू-जल के अनुपात नलकूपों के संतुलित निर्माण का रास्ता अख्तियार करने की जरुरत है ! भू-जल की उपलब्धता की अपेक्षा नलकूपों एवं ट्यूबेल की बढ़ती संख्या भी भू-जल स्तर में गिरावट की एक वजह है ! इस दिशा में हमारे असफल होने की बड़ी वजह यह भी है कि हम मृदा और पानी का दोहन रोकने में लागतार नाकामयाब हो रहे हैं और पानी के बाजार पर नियंत्रण करने को लेकर संवेदनशील नहीं हो रहे !ज्ञात हो कि अकेले भारत में पानी एक बहुत बड़ा कारोबार बनता जा रहा है ! अत: हमें जल दोहन पर नियंत्रण की नीति अपनाने की सख्त जरुरत है ! साथ ही जल स्वच्छता पर भी हमें जागरूक होने की जरुरत है ताकी जल-प्रदुषण पर लगाम कसा जा सके ! सरकार को सबसे पहले अद्द्योगिकीकरण के कारण प्रदूषित हो रहीं नदियों पर ठोस उपाय करने की जरूरत है जिससे कि नदियों के प्रदूषण में कमी लाई जा सके ! जल की स्वच्छता एवं संरक्षण के प्रति सरकार के साथ-साथ समाज को भी गंभीर होकर अपनी जवाबदेही तय करने की जरुरत है ! जल जीवन से जुड़ा प्रमुख मसला है अत: इसे महज क़ानून और नीति निर्माण से नहीं बल्कि सामाजिक जवाबदेही के द्वारा ही संरक्षित एवं सुरक्षित किया जा सकता है ! हमें याद रखना होगा कि जल संरक्षण के प्रति हम अगर आज गंभीर नहीं हुए तो आगामी दस वर्षों में एक अरब से ज्यादा लोग पानी के अकाल की त्रासदी को झेलने को मजबूर होंगे जो कि ना किसी एक देश बल्कि समूची दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है और समूची दुनिया पानी के आगोश में समा जायेगी !
शिवानन्द द्विवेदी सहर
केन्द्र पर नकेल कसते क्षेत्रीय दल : दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित मेरा लेख (21- मार्च-13)
आजादी के बाद की भारतीय केंद्रीय राजनीति में राजनीतिक दलों के उद्दभव एवं उनके प्रभावों को दो काल-खण्डों में विभाजित करके ज्यादा बेहतर समझा जा सकता है !राजनीति का वो भी एक दौर था जब कांग्रेस सत्ता में थी और सदन में विपक्ष के नाम पर महज गिने-चुने कुछ नाम दिखते थे जबकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां उस दौर के बिलकुल विपरीत नजर आती हैं ! आज 203 लोकसभा सीट जीत कर देश की सबसे बड़े राजनीतिक पार्टी के रूप में सत्ता में बैठी कांग्रेस को मात्र 18 लोकसभा सीट जीतने वाली डीएमके द्वारा आँखे क्या दिखाई जाती हैं कि केन्द्र सरकार के तीन-तीन शीर्षस्थ मंत्रियों को डीएमके प्रमुख की मान-मनौवल करने उनके दरवाजे तक जाना पड़ जाता है ! हालाकि डीएमके द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के ऐलान से सरकार के संख्या बल पर कोई ऐसा संकट नहीं आ रहा है जिससे उसका बहुमत प्रभावित हो रहा हो,क्योंकि सरकार को यू.पी की दो बडे राजनीतिक दलों का बाहर से समर्थन प्राप्त है ! इसलिए डीएमके प्रमुख के मान-मनौवल के लिए तीन-तीन मंत्रियों के जाने को सरकार बचाने की चिंता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ! इस पुरे मान-मनौवल के राजनीतिक मायने बहुत दूरगामी हैं ! कांग्रेस सहित सभी दलों को इस बात का बखूबी अंदाजा है कि केन्द्र की राजनीति में सत्ता के समीकरण अब क्षेत्रीय दलों एवं उन दलों के क्षत्रपों की भूमिका के बिना किसी भी राष्ट्रीय दल के बनते नहीं दिख रहे ! भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का व्यापक प्रभाव कायम हुए अभी दो दशक ही हुए हैं लेकिन इन दो दशकों में ही क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने दिल्ली की राजनीति को काफी प्रभावित किया है ! नब्बे के दशक के अंतिम दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के नतृत्व में 24 छोटे-बड़े दलों को जोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया गया एवं सत्ता का समीकरण तैयार किया गया ! एनडीए के गठन को केन्द्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के हस्तक्षेप की शुरुआती कड़ी के रूप में देखा जा सकता है ! हालाकि ऐसा नहीं कहा जा सकता है नब्बे के दशक से पहले क्षेत्रीय दलों का कोई अस्तित्व ही नहीं था या उनकी किसी राज्य में सरकार नहीं थी ! उस दौर में पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार बन चुकी थी एवं दक्षिण के राज्यों में भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल उभर कर सामने आने लगे थे ! मगर इस बात से भी गुरेज नहीं होनी चाहिए कि नब्बे के दशक अथवा एनडीए के गठन से पहले केंद्रीय राजनीति में इन दलों का हस्तक्षेप बहुत प्रभावी नहीं था ! वर्तमान राजनीति के प्रभावी क्षेत्रीय दलों पर अगर नजर डाले तो एन.सी.पी और तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दल तो ऐसे हैं जो नब्बे के दशक के अंतिम दौर में कांग्रेस से ही अलग होकर बने और आज केन्द्र की राजनीति का अहम हिस्सा साबित हो रहे हैं ! एनडीए का गठन एक तरह का ऐसा राजनैतिक बदलाव था जिसमे राज्यों की राजनीति में सिमटे लोक जनशक्ति पार्टी जैसे तमाम क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप भी एनडीए का हिस्सा बनकर केन्द्र की सियासत करते नजर आये ! नब्बे के दशक में ही उत्तरप्रदेश के दो बड़े राजनीतिक दल संगठनात्मक रूप से सशक्त होकर उभरे और वर्तमान राजनीति में दोनों ही यू.पी.ए सरकार के खेवनहार बने हुए हैं ! क्षेत्रीय दलों के केंद्रीय हस्तक्षेप एवं राजनीतिक उत्थान के नजरिये से नब्बे का दशक बहुत महत्वपूर्ण रहा है ! हालाकि गठबंधन के नजरिये से अगर देखा जाय तो नरसिम्हा राव सरकार में भी कुछ दलों का वाह्य समर्थन कांग्रेस द्वारा लिया गया था ! लेकिन केंद्रीय राजनीति में घटकों का कोई पहला संगठनात्मक ढांचा पहली बार एनडीए के तौर पर ही सामने आया !नए राजनीतिक दलों के अस्तित्व में आने के नजरिये से नब्बे का दशक भारतीय दलीय प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण काल कहा जा सकता है ! उसी दौर में कांग्रेस में टूट पैदा हुई और ममता बनर्जी एवं शरद पवार जैसे नेता अलग होकर अपना राजनीतिक दल बनाये और आज वर्तमान की केंद्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं ! वर्तमान केंद्रीय राजनीति में इन तमाम क्षेत्रीय दलों का प्रभाव समय-समय पर दिखता भी रहता है ! आजाद भारत में दलीय व्यवस्था के आधार पर विभाजित दो काल-खंडों के बीच का बड़ा फर्क यही है कि पहला काल-खण्ड एकदलीय राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह एवं आंदोलनों का रहा है जबकि दूसरे कालखंड में बहुदलीय राजनीति व्यवस्था सशक्त रूप से केंद्रीय राजनीति में अपना हस्तक्षेप कर रही है !
भारतीय राजनीति में पिछले दो दशकों में तेजी से विकसित हुए क्षेत्रीय दलों के प्रभाव के कारणों का जायजा लिया जाय तो कई कारण नजर आते हैं ! कहीं ना कहीं आपातकाल के कारण देश की जनता के मन में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की समझ विकसित हुई ! सत्ता के केन्द्रीयकरण से असंतुष्ट जनता के बीच तत्कालीन कांग्रेस सरकार की मनमानी रास नहीं आई और परिणामत: क्षेत्रीय दलों के प्रति जनता ने भरोसा दिखाना शुरू किया ! इस संदर्भ में अगर यू.पी एवं बिहार में क्षेत्रीय दलों के प्रादुर्भाव को ही देखें तो यू.पी में दलित बहुजन का मुद्दा लेकर दलित वोटर्स का ध्रुवीकरण करने के लिए कांशीराम आगे आये तो वहीँ यादव-पिछड़ा-मुस्लिम वोटर्स के एजेंडे पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का जन्म हुआ ! यू.पी में नवगठित इन दोनों राजनीतिक दलों ने कांग्रेस के वोटबैंक में ही सेंध लगाईं और समय पडने पर राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस के खिलाफ लामबंद भी हुए ! वहीँ बिहार में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव समीकरण तैयार कर कांग्रेस और वामपंथ की जमीं खिसका दिया ! राज्यों के स्थानीय मुद्दों पर स्थानीय सियासत करने एवं जातिगत आधार पर एजेंडा तय करने का यह फार्मूला क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विकास की वजह बना ! कभी कांग्रेस के धुर समर्थक रहे दलित और मुस्लिम आजकल यू.पी में कांग्रेस से बहुत दूर हो चुके हैं ! कमोबेश यही हालात राष्ट्रीय दलों का बिहार में भी है क्योंकि बिहार में नितीश के साथ गठबंधन के कारण ही भाजपा ठीक स्थिति में नजर आती है !
क्षेत्रीय क्षत्रपों को केंद्रीय राजनीति में अपनी हैसियत का अंदाजा बखूबी है तभी तो बिहार से आकर नितीश कुमार दिल्ली में अधिकार रैली करते हैं और यह कहते हैं कि जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगा दिल्ली उसी की होगी ! नितीश के इस बयान को केवल कांग्रेस नहीं बल्कि भाजपा पर भी चलाये गए निशाने के तौर पर देखा जाना चाहिए ! नितीश ने अपनी क्षमता का आकलन करते हुए ही कहा कि देश की दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में किसी को सरकार बनाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी ! वहीँ दिल्ली तख़्त को अक्सर घुडकी देते रहने वाले मुलायम सिंह यादव का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप तो अक्सर दिखता रहता है ! वहीँ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का केंद्रीय राजनीति में हस्तक्षेप तो कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों को प्रभावित करता रहा है ! बेशक ममता बनर्जी अभी यू.पी.ए से बाहर हैं लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा एवं कांग्रेस दोनों राजनीतिक गठबंधनो की नजर उनपर भी बनी हुई है ! केंद्रीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव अब इतना बढ़ चुका है कि अक्सर तीसरे मोर्चे तक की बात सरकार बनाने के लिए उठती रहती हैं ! आजादी के अंतिम तीन दशकों की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय क्षत्रपों की ताकत भी बढ़ी है ! इसका सबसे बड़ा उदाहरण यू.पी विधानसभा चुनाव में देखने को मिल चुका है जहाँ राष्ट्रीय दलों के प्रमुख क्षत्रप के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा,सलमान खुर्शीद योगी आदित्यनाथ सहित कई क्षत्रपों की मुश्किलें बढ़ी हैं ! वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिवेश को देखते हुए इतना कहा ही जा सकता है कि आजाद भारत के अंतिम तीन दशकों का दौर बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था के विकास वाला रहा है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर
रविवार, 10 मार्च 2013
दवा परीक्षण का अवैध धंधा : जनसत्ता में कवर पेज पर प्रकाशित मेरी फुल पेज स्टोरी
दवाओं के अवैध परीक्षण पर मेरी यह विस्तृत रिपोर्ट 10 मार्च-13 के जनसत्ता में रविवारी के कवर पेज प्रकाशित हुई है !
शिवानन्द द्विवेदी सहर
स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के निवारण के लिए दवाइयां जितनी आवश्यक होती हैं अगर दवाइयों का इस्तेमाल गलत ढंग से होने लगे तो उतनी ही जानलेवा भी साबित होती हैं ! 2005 से लेकर 2012 तक पिछले सात सालों में दवाइयों के परीक्षण को लेकर सरकारी हीला-हवाली एवं लोगों के सेहत से खिलवाड़ किये जाने सम्बन्धी जो पुख्ता आंकड़े प्राप्त हुए हैं वो ना सिर्फ चौकाने वाले हैं बल्कि स्वास्थ्य और सेहत को लेकर केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों एवं सम्बंधित विभागों के लापरवाहीं की पोल खोल रहे हैं ! स्वास्थ्य मामलों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था की पहल पर ड्रग्स नियंत्रक कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी जानकारी के मुताबिक़ भारत में ड्रग्स ट्रायल क़ानून 2005 संशोधन लागू होने के बाद जनवरी 2005 से लेकर जून 2012 के बीच कुल 475 नए रासायनिक तत्वों से बनी दवाओं के परीक्षण की इजाजत दी गयी है ! बताना जरूरी होगा कि नए दवाओं का परीक्षण सबसे ज्यादा जोखिम भरा परीक्षण होता है जिसके अत्यंत गंभीर परिणाम आने का डर रहता हैं ! इन 475 दवाओं के परिक्षण के लिए कुल 57,303 मरीजों के समूह को लिया गया जिनमे अबतक 39,022 मरीजों का परीक्षण काल पूरा हो चुका है जबकि 18,281 मरीज अभी भी अंडर क्लिनिकल ट्रायल हैं !475 दवाओं के परिक्षण और 39,022 मरीजों के इस्तेमाल के बाद मात्र 17 दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति प्राप्त हो पाई है जबकि शेष बहुत सारी दवाओं को मरीजों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना गया हैं ! पिछले पाँच सालों में चले इन दवाओं के परीक्षणों के दौरान कुल 2644 लोगों की मौत हुई जिनमे 80 लोगों के मौत की आधिकारिक पुष्टि दवाइयों के नाकारात्मक असर के कारण की गयी है ! हालाकि शेष लोगों की मौत किन वजहों से हुई है यह अभी सवालों के घेरे में हैं और इसके जांच की मांग स्वास्थ्य पर काम करने वाले तमाम संगठनों द्वारा की जा रही है ! इन संगठनो का दावा है कि अगर निष्पक्ष जाँच किया जाय तो परीक्षण के दौरान मरे तमाम लोगों के मृत्यु की वजह के रूप में दवाइयों का नाकारत्मक असर ही कारण के रूप आएगा जिसे दवा कंपनियों एवं डाक्टरों द्वारा छुपाया जा रहा है ! इन 475 दवाओं के परीक्षण के दौरान कुल 11975 लोग तमाम तरह की प्रतिकूल स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार पाए गए जिनमे 506 लोगों के स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के पीछे परीक्षण के दौरान इस्तेमाल दवाओं को कारण बताया गया ! हलाकि यह भी जांच का विषय है क्योंकि जांच के बाद 506 के इस आंकड़े में भारी इजाफा भी होने की संभावना जताई जा रही है !ज्ञात हो कि इस मामले पर राज्यसभा में भी सवाल पूछे जा चुके हैं एवं स्वास्थ्य मामलों की संसदीय समिति की रिपोर्ट भी जारी की जा चुकी है जिसमे दवाओं के परीक्षण में हुई भारी स्तर पर लापरवाही को देखा गया है !
भारत में मरीजों पर दवाओं के परिक्षण के दौरान मृत्यु होने की दशा में अथवा स्वास्थ्य क्षतिपूर्ति के संबंध में पीड़ित पक्ष को मुआवजा दिये जाने एवं वीमा कराये जाने सम्बन्धी कोई ठोस क़ानून ना होने की वजह से अभी तक मात्र 40 मृतकों के परिजनों को दवा कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से औनी-पौनी राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी है ! औषधि एवं प्रसाधन क़ानून 1945 में संशोधन प्रस्ताव 2005 लाये जाने के बावजूद परिक्षण के दौरान सबसे ज्यादा खतरे के घेरे में रहने वाले मरीजों के मुआवजे एवं वीमा आदि के संबंध में कोई ख्याल नहीं रखा गया !जिन गिने-चुने मरीजों के नाम मुआवजे की राशि दी भी गयी तो उस राशि एवं उन्ही दवा कंपनियों द्वारा अन्य देशों में पीडितों को दी जाने वाली मुआवजा राशि में भारी दोहरापन का रवैया कंपनियों द्वारा बरता गया ! 2011 में जिस कंपनी ने दवा परिक्षण के दौरान हुई एक स्त्री की मौत के मुआवजे के तौर पर नाइजीरिया में लगभग अस्सी लाख रुपये का मुआवजा दिया उसी कंपनी ने भारत में हुई एक मौत पर मात्र ढाई लाख रुपये मुआवजे के तौर पर दिया ! मुआवजे कि राशि को लेकर ठोस कानूनी प्रावधान ना होने की वजह से दवा कम्पनियाँ अपने मनमाने कीमतों पर जिंदगियों का सौदा करती रही हैं ! कानूनी तौर पर लचर एवं दवा कंपनियों के अनुकूल प्रावधान होने की वजह से ही दवाओं के परिक्षण के नजरिये से विदेशी दवा कंपनियों द्वारा बड़ी संख्या में भारत का रुख किया जा रहा है !475 नए रसायनों के अलावा लगभग 1500 अन्य दवाओं का परिक्षण वैध एवं अवैध तरीके से देश के तमाम अस्पतालों एवं संस्थानों में किया जा रहा है ! स्वास्थ्य के खतरों से बेपरवाह स्वास्थ्य मंत्रालय भी अभी तक इस मसले पर चुप्पी ही साधे हुआ था ! फिलहाल सर्वोच्च न्यायलय के समय-समय पर किये जाते रहे हस्तक्षेप के बाद यह मामला स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवों के हाथ पहुँच सका है !हाल ही में सम्बंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए 30 जनवरी 2013 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम लोढा एवं न्यायमूर्ति आर दवे की खंड्फीठ द्वारा दिये गए सख्त निर्देश में यह कहा गया है कि हर तरह के दवा परीक्षण स्वास्थ्य सचिवों की देख-रेख में ही किये जाए एवं मरीजों को इस बात से पहले ही अवगत कराया जाय कि उनके ऊपर उक्त दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है ! मरीज को यह बताना अनिवार्य होगा कि उक्त दवा के परिक्षण से उसके स्वास्थ्य पर किस तरह के नाकारत्मक प्रभाव के पड़ने की संभावना है ! साथ ही मरीज का स्वास्थ्य वीमा लेना अनिवार्य होगा ! इस मसले पर सख्त होते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने इन नियमों का उलंघन करने वालों पर 5 से 10 साल की कैंद का प्रावधान रखा है ! लेकिन सवाल ये है कि नियमों को ताक पर रख कर पिछले सात सालों में जिन पचासों हजार मरीजों के साथ छलावा हुआ है उनकी भरपाई कैसे की जायेगी ?
कम से कम आंकड़े तो यही बताते हैं कि दवाओं के परीक्षण को लेकर भारत एक बेहद खतरनाक प्रयोगशाला बनता जा रहा है जहाँ मानव शरीर का इस्तेमाल मशीनों की तरह किया जा रहा है !लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन से बेपरवाह इन दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों की मिली-भगत से आजतक ना जाने कितने उन लोगों को अपना प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शिकार बनाया होगा,इसका कोई आंकड़ा किसी के पास मौजूद नहीं है ! आंकड़ों से जुदा ना जाने कितने लोग ऐसे होंगे जो दवाओं के अवैध परीक्षण के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठे होंगे और ना जाने कितने स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से आज भी ग्रसित जीवन जीने को मजबूर होंगे ! तमाम आधिकारिक सूत्रों से प्राप्त दवाओं के परीक्षण सम्बन्धी इन आंकड़ों को अगर बारीकी से समझने की कोशिश की जाय तो तमाम तरह के सवाल उभर कर सामने आते है ! बड़ा सवाल ये है कि जिन दवाओं की कोई जरुरत नहीं है उन दवाओं के परीक्षण की इजाजत ही क्यों दी गयी और अगर कुछ जरूरी परीक्षण की इजाजत दी भी गयी तो उसके पुख्ता नियामक क्यों नहीं तय किये गए ? दवाओं के परीक्षण के दौरान इन सात सालों में लोगों को अँधेरे में रखकर उनके स्वास्थ्य एवं जीवन से जमकर खिलवाड़ किया गया हैं ! प्राप्त आंकड़ों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि अगर इस पुरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाय तो तमाम लोग गैर-इरादतन हत्या,भ्रष्टाचार सहित अन्य कई मामलों में दोषी पाए जायेंगे ! इस पुरे मामले के हर पहलू पर गंभीर जांच होनी ही चाहिए !
क्या है दवा परिक्षण प्रक्रिया की खामियां
सामान्यतया ऐसे रसायन जिनका आविष्कार पहले कभी नहीं हुआ उन दवाओं का परीक्षण सबसे अधिक जोखिम भरा होता है ! ऐसी दवाओं के खतरों के कारण दुनिया के तमाम विकसित देश इन दवाओं के परीक्षण की इजाजत नहीं देते लेकिन भारत में ऐसी दवाओं का परीक्षण भी धड़ल्ले से हो रहा है ! इन दवाओं का परीक्षण मूलतया चार चरणों में किया जाता है ! प्रथम चरण में इन दवाओं के जहरीले ना होने का परीक्षण जानवरों पर किया जाता है उसके बाद द्वितीय चरण में कुछ मरीजों के ऊपर इन दवाओं का परीक्षण किया जाता है ! तीसरे चरण में इन दवाओं का परीक्षण बड़ी संख्या में लोगों पर किया जाता है फिर अंतिम चरण में इन दवाओं का परीक्षण हजारों की संख्या में लोगो पर किया जाता है !कानूनी लचरता के कारण प्रथम चरण से लेकर तीसरे चरण तक के परीक्षण भारत में अन्य देशों की तुलना में ज्यादा आसानी से संभव हो पाते है ! इन परीक्षणों के दौरान परीक्षकों द्वारा विविध प्रकार की जनजातियों एवं बीमारियों वाले भौगोलिक क्षेत्रों के मानकों को दरकिनार कर रखा जाना इन परीक्षणोंको और जोखिम भरा बनाते हैं ! विशेषज्ञों की राय में ऐसा बताया गया है कि जो दवा मंगोल जनजाति के मरीजों के लिए उपयुक्त साबित हुई है कोई जरूरी नहीं है कि वही दवा द्रविण समुदाय के लोगों के लिए भी उपयुक्त होगी !आश्चर्यजनक ढंग से इंदौर के महात्मा गाँधी चिकित्सा महाविदद्यालय में शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा लगभग 2700लडकियों पर ह्यूमन पेपलिना वायरस की दवा को आजमाया गया जबकि इस प्रदेश में यह बीमारी अस्तित्व में ही नहीं है ! जिन बीमारियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है या उनके अन्य उपचार उपलब्ध हैं वहाँ नए प्रयोगों को करना स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है ?
परीक्षण में लापता बच्चों का इस्तेमाल
इसी मामले को अगर एक अन्य समस्या के साथ जोड़कर देखा जाय तो पिछले पाँच सालों में कई हजारों की संख्या में गरीब तबके के बच्चे अगवा किये गए हैं ! ऐसे बच्चों को अगवा कर अथवा बहला-फुसला कर इनके ऊपर दवाओं का अवैध तरीके से परीक्षण किये जाने की संभावना तमाम संगठनों द्वारा जताई जाती रही है ! गरीब तबके के अनपढ़ अथवा अशिक्षित बच्चों को बहला-फुसला कर एवं थोड़े बहुत रुपयों का लालच देकर भी इस तरह के कार्यों को अंजाम दिया जाता रहा है ! दवाइयों के परिक्षण में इन मासूमो का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है,इस संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता ! लापता हो रहे बच्चों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था ने ऐसा अंदेशा जताया है कि आधिकारिक आंकड़ों के अलावा चल रहे देश में अन्य सक्रिय अवैध दवाओं के परीक्षण केन्द्रों पर इन्ही मासूमो को मशीन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है ! बच्चों के स्वास्थ्य के नजरिये से यह बेहद खतरनाक है !
अवैध कमाई कर रहे डाक्टर
बेशक दवाइयों के परिक्षण में जिंदगी को जाने-अंजाने दाँव पर लगा रहे मरीजों के हाथ कुछ आये ना आये लेकिन डाक्टर्स की जेबें लागातार मोटी हो रहीं हैं ! भारत में दवाइयों के परिक्षण का कुल कारोबार लगभग 2500 करोंड़ के आस-पास पहुँच चुका है ! आर्थिक अपराध ब्यूरो द्वारा दी गयी रिपोर्ट में जो बताया गया है वो सीधे तौर पर इस पुरे मामले में डाक्टरों की मिलीभगत की पुष्टि करता है ! रिपोर्ट में बताया गया गया है कि मध्यप्रदेश के इंदौर में अलग-अलग अस्पतालों में 3202 मरीजों पर दवाओं का परिक्षण बिना उनको इस परिक्षण से अवगत कराये पाँच चिकत्सकों द्वारा किया गया जिसके एवज में दवा कंपनियों द्वारा कुल 3 करोंड़ 57 लाख रुपये की धनराशि उन चिकत्सकों के निजी खातों में दी गयी ! बिना बताये किये गए इन परीक्षणों में कुल 81 मरीजों में से कुछ को दवाओं के दुष्प्रभावों के चलते जान से हाथ धोना पड़ा और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित हैं ! हैरानी की बात ये है कि दवाओं के परिक्षण के नाम पर करोंडों की उगाही करते इस चिकित्सकों की जेबें तो कंपनियों द्वारा खूब गरम की जा रहीं हैं लेकिन पीडितों को अभी तक मुआवजे के नाम पर कुछ भी नहीं मिल सका है ! जिन पाँच डाक्टरों ने इन मरीजों पर परिक्षण किया उनमे से एक चिकित्सक एथिक्स कमेटी के ज्वाइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं और एक विभागाध्यक्ष के पद पर तैनात रहे हैं !इन चिकित्सकों पर अभी तक कोई कार्यवाई नहीं हो सकी है !
कब-कब हुईं कितनी मौतें
2007 में परीक्षण के दौरान 137 मरीज मरे
2008 में परीक्षण के दौरान 288 मरीज मरे
2009 में परीक्षण के दौरान 637 मरीज मरे
2010 में परीक्षण के दौरान 671 मरीज मरे
2011-12 में परीक्षण के दौरान 911 मरीज मरे
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