शनिवार, 31 अगस्त 2013

साहित्य-संस्कृति के समृद्धि का सेतु : राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर

राष्ट्रीय सहारा
साहित्य की आम धारणाओं के अनुसार किसी भी भाषा में लिखी गयी लिपिबद्ध सामग्री को किसी दूसरी भाषा में ज्यों का त्यों बिना उसके मूल तथ्यों से छेड़-छाड़ किये लिखा जाना ही अनुवाद-कर्म कहलाता है ! अनुवाद-कर्म के संदर्भ में  यह आम धारणा जितनी सहज और सपाट  नजर आती है वास्तविकता के धरातल पर इसके मायने उतने ही बहुआयामी हैं ! अनुवाद-कर्म  का दायरा सिर्फ साहित्य की तमाम विधाओं और बहु-भाषाओं में अनुवादक की निपुणता तक सीमित नहीं है ! वास्तविक तौर पर अगर देखा जाय तो अनुवाद-कर्म  एक राष्ट्रीय कर्म है जो कभी एक राष्ट्र की संस्कृति को दूसरे राष्ट्र की संस्कृति से जोड़ने का काम करता है तो कभी एक समाज को दूसरे समाज के साथ जुडने के लिए प्रेरित करता है ! सीधे-सपाट शब्दों में अगर कहा जाय तो संकुचित और शिथिल पड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपदाओं को  विस्तार देने का एकमात्र माध्यम अनुवाद ही है ! साहित्य में सृजन और रचनाकर्म के समानांतर या उससे एक कदम आगे बढ़कर ही अनुवाद की भूमिका है ! सृजन महज किसी रचना अथवा कृति को मूर्त रूप देता है जबकि अनुवाद की भूमिका उस सृजन और बहु-संस्कृतियों के बीच समन्वय-सेतु बनकर उस रचनाकर्म को  गतिशील बनाने की होती  है ! भारतीय साहित्य के संदर्भ में अगर वर्तमान अनुवाद-कर्म का मूल्यांकन किया जाय तो स्थिति उतनी संतुष्टिपरक नहीं नजर आती जितनी की जरुरत है ! ऐतिहासिक रूप साहित्य और सृजन की दिशा  में अनुवाद और अनुवादक दोनों ही आदिकाल से ही प्रासंगिक रहे हैं ! अनुवादक एक प्रकार का भाषाई दूत होता है जो अपने प्रयासों से किसी एक भौगोलिक चारदीवारी में सिमटती साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्पदा को भूगोल की सीमा से बाहर ले जाते हुए अन्य संस्कृतियों से रूबरू कराता है ! अनुवाद और अनुवादक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कालजयी कृति मधुशाला के रचयिता डा. हरिवंश राय बच्चन कहते हैं  अनुवाद एक भाषा का दूसरे भाषा की तरफ बढ़ाया गया मैत्री का हाथ होता है ! मैत्री का यह हाथ अधिकतम जितनी बार और जितनी दिशाओं में संभव हो सके बढ़ाया जाना चाहिए !” अनुवाद कोई साहित्य के आधुनिक काल में  खोजी गयी कला नहीं है बल्कि यह आदि काल से सामाजिक जरुरत के रूप में चली आ रही प्रथा है ! बेशक समय के साथ-साथ साहित्य के तमामों कालों का प्रभाव अनुवाद-कर्म पर पड़ता रहा हो लेकिन अनुवाद का इतिहास तो हजारों वर्ष पुराना ही नजर आता है ! अनुवाद-कर्म के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अगर नजर डाले तो आज के लगभग डेढ़ दशक पूर्व चौथी शताब्दी के अंतिम दौर में चीनी यात्री फाहियान द्वारा लगभग पच्चीस वर्षों तक भारत भ्रमण कर साहित्यिक संपदाओं का संकलन तैयार किया गया ! तत्कालीन दौर में हिंदी नामक कोई भाषा वजूद में नहीं थी और लगभग सभी ख्यातिलब्ध साहित्यिक सामग्री संस्कृत में उपलब्ध थी ! अत: फाहियान ने भारत यात्रा के दौरान संस्कृत व्याकरण का गहन अध्यन किया एवं यहाँ से कई पुस्तकों का संकलन लेकर चीन वापस लौटा जहाँ उसका चीनी भाषाओं में अनुवाद किया गया ! ऐसी मान्यता है कि अनुवाद-कर्म के मामले में चीन का इतिहास भारत से ज्यादा समृद्ध रहा है और चीनी यात्रियों ने दुनिया के हर कोने से लाये गए विभिन्न भौगोलिक संस्कृतियों का अनुवाद किया है ! अनुवाद के इतिहास का पहिया कभी जड़ नहीं रहा है बल्कि सदा ही गतिशील रहा है ! संस्कृत से चीनी भाषाओं में अनुवादित सामग्री सातवीं शताब्दी के शुरुआत में ही जापान पहुँच चुकी थी और उसका जापानी भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका था ! अनुवाद का इतिहास कम से कम इतना तो जरुर बता पाने में सक्षम होता है कि अनुवाद-कर्म कोई साहित्य की नई-नवेली विधा नहीं बल्कि साहित्य की सबसे पुरानी रीतियों में से एक है !
      साहित्य और संस्कृति के समृद्ध होने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका पर तो कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता ! लेकिन सवाल की सुई भारतीय बहुभाषाई साहित्यिक सम्पदा में अनुवाद-कर्म की जड़ता पर जरुर उठते रहे हैं ! सांस्कृतिक एवं भाषाई पृष्ठिभूमि के नजरिये से भारत एक बहुभाषाई भूगोल में फैला देश है ! सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधताओं के बीच अनुवाद-कर्म के प्रति हमारा रुझान किस स्तर का है इसका मूल्यांकन अवश्य किया जाना चाहिए ! बड़ा सवाल ये है अनुवाद-कर्म के माध्यम से दुनिया को अपनी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संपदा उपलब्ध कराने वाला भारत क्या आंतरिक भाषाओं के बीच अनुवाद को उतना महत्व दे रहा है जितना कि वाकई दिया जाना अत्यंत जरूरी है ? साहित्य एकादमी के अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार विश्वनाथ तिवारी ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा “हमें समस्त चौबीस भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने पर काम करना होगा ! सभी चौबीस भाषाओं के बीच आपसी समरसता एवं सामंजस्य को बिठाए बिना अगर हम किसी एक भाषा को ही ढोने लगेंगे तो कहीं ना कहीं हम अपनी सम्पूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपदाओं को दुनिया के सामने नहीं रख पायेंगे !” डा. विश्वनाथ तिवारी के इन वक्तव्यों के मायनों को गहराई से समझने की जरुरत है ! भाषाओं को आधारभूत मानकर पचास के दशक में हुए राज्यों के गठन ने देश में भाषाई वैमनष्य की भावना को बल दिया जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय भाषाएँ ही एक दूसरे से जुडने की बजाय दूर होती गयीं ! अनुवाद-कर्म के मामले में जितना काम हिंदी साहित्य  के अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद पर हुआ है उसका दशांश भी भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद पर नहीं हुआ है ! भारत की तमाम भाषाओं में सृजित साहित्य का अनुवाद भारतीय भाषाओं में ही ना हो पाने का परिणाम है कि हम दक्षिण से उत्तर तक एक सार्वभौमिक संस्कृति स्थापित करने में नाकाम रहें हैं ! आंतरिक भाषाई द्वेष ने अनुवाद-क्रम को प्रभावित किया तो वहीँ अनुवाद ना होने के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी ना के बराबर रहा ! विविधताओं वाले इस देश में जहाँ दो दर्जन से ज्यादा भाषाएँ अपने साहित्यिक समृद्धि एवं संपदाओं के साथ अलग-अलग भौगोलिक दायरों में बंटी हुई हैं उसमे अनुवाद ही एकमात्र ऐसा माध्यम दिखता है जिसके द्वारा इस सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विषमता की गहरी होती खाई को पाटा जा सकता है !  भारतीय सांस्कृतिक विविधताओं में यह वक्तव्य बेहद सटीक एवं प्रासंगिक लगता है जिसमे डा. गोपीनाथन कहते हैं “भारत जैसे बहुभाषी लोगों के देश में अनुवाद की उपादेयता स्वयंसिद्ध है!”
      इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख मजबूत करनी है तो उसे अपनी सम्पूर्ण सांस्कृतिक उर्जा का प्रदर्शन करना होगा ! सम्पूर्ण सांस्कृतिक उर्जा का प्रदर्शन तभी संभव है जब भारत की समस्त साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सम्पदा का एकत्रीकरण किया जा सके ! चिंताजनक है कि  जिस अनुवाद कर्म को हजारों साल पहले चीन और जापान जैसे देशों द्वारा पांचवी शताब्दी में दुनिया के साहित्यों के लिए इस्तेमाल किया गया उस अनुवाद-कर्म को भारत द्वारा अपने ही बिखरी पड़ी साहित्यिक संपदाओं को सहेजने के लिए अभी तक प्रयोग नहीं किया जा रहा है  ! हालाकि इस दिशा में केंद्रीय ट्रांसलेशन ब्यूरो जैसी सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं मगर अनुवाद में उन्मुक्त रचनाशीलता का अभाव अभी तक बना हुआ है ! साहित्य से सरोकार रखने वाला हर भाषाई जानकार अनुवाद-कर्म की बजाय स्व-सृजन की तरफ भागता नजर आ रहा है ! समकालीन वर्तमान साहित्यकारों में सृजनशीलता के अनुपात में अनुवाद-कर्म के प्रति आकर्षण बहुत कम देखने को मिल रहा है ! 

असुरक्षित होती भारत-नेपाल सीमा : दैनिक जागरण नेशनल में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर


दैनिक जागरण नेशनल
पन्द्रह दिनों के अंतराल में भारत-नेपाल सीमा से दो-दो आतंकवादियों को सीमा पार करते हुए पकड़ा जाना एक बार फिर इस बात को साबित करता है कि भारत-नेपाल सीमा से आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता रहा है ! हालाकि यह बात कभी किसी से छुपी नहीं रही है कि भारत-नेपाल सीमा के रास्ते पाकिस्तान के आतंकी संगठन आसानी से घुसपैठ कर पाने में सफल रहते हैं ! लेकिन बम बनाने का मास्टर माइंड अब्दुल करीम टुंडा एवं एक इन्डियन मुजाहिद्दीन के आतंकी भटकल की गिरफ्तारी ने इन कयासों पर एकबार फिर मुहर लगाने का काम किया है ! दरअसल, भारत-नेपाल सीमा को आतंकियों द्वारा इस्तेमाल किये जाने की प्रमुख वजह ये है कि इस सीमा को लेकर हमारी नीतियां हमेशा से बेहद लापरवाह एवं उपेक्षापूर्ण रही हैं !  सही बात तो ये है कि भारत-नेपाल सीमा को लेकर  राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस नीति निर्माण का ना तो विशेष प्रयास ही किया गया है और ना ही इसे मुख्यधारा के अंतर्राष्ट्रीय मामले के तौर पर स्वीकार ही किया जाता  है ! रक्षा मंत्रालय एवं गृह मंत्रालय दोनों ही सीमा-सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा के मसले पर नेपाल-भारत सीमा पर चुप्पी साधे हुए हैं और किसी भी नीतिगत निर्णय का खाका तक नहीं तैयार कर पाए हैं ! सरकारों द्वारा नेपाल-भारत सीमा सुरक्षा के मसले पर दिखाई जा रही इस असंवेदनशीलता का कतई यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि नेपाल सीमा पूर्णतया सुरक्षित है और वहाँ सब कुछ शांतिप्रिय ढंग से चल रहा है ! सरकार को यह बात बखूबी पता होनी चाहिए  कि राजशाही के खातमे एवं माओवादी संघर्षों के बाद से अभी तक नेपाल की आंतरिक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है और नेपाल अपने आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है जिसका असर निकटतम पड़ोसी होने के नाते भारतीय सीमा पर पड़ना स्वाभाविक है  ! एक लम्बे हिंसक संघर्षों के बाद जब नेपाल में  राजशाही का अंत हुआ और सत्ता में माओवादियों की हिस्सेदारी सुनिश्चित  हुई तो निश्चित तौर पर भारत-नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर असर पड़ना स्वाभाविक था, और पड़ा भी !संबंधो के बदलते नजरिये का ही फर्क ही तो था कि नेपाल द्वारा भारत के साथ हुए साठ के दशक के उस समझौते को ताक पर रखते हुए नए हथियार खरीदे गए,जिसमे कहा गया था कि नेपाल कोई भी हथियार आदि बिना भारत की अनुमति के नहीं खरीदेगा ! अगर बात सत्ता बदलावों से भारत सीमा सुरक्षा पर पड़े असर की करें तो उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से सटे नेपाल सीमा पर हालात लागातार नाजुक होते जा रहे हैं और आये दिन नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम को को बढाने का काम किया जाता रहा है ! अभी कुछ ही महीनो पहले नेपाल के माओवादी नेता मोहन वैद्य के नेतृत्व वाले माओवादी गुट द्वारा भारत से नेपाल जाने वाली गाड़ियों को लेकर जो हिंसात्मक रुख अख्तियार किया गया जिसमे तमाम गाड़ियों को निशाना बनाया गया लेकिन उस पर भारत द्वारा कोई अंतर्राष्ट्रीय कदम नहीं उठाया जाना, कहीं ना कहीं हमारी असंवेदनशीलता एवं नेपाल सीमा को लेकर हमारी लचर नीति को दर्शाता है ! नेपाल की तरफ से भारत विरोधी मुहीम अक्सर चलाई जाती रही हैं बावजूद इन सबके इस अंतर्राष्ट्रीय समस्या पर अभी तक हमारी सरकार गंभीर नहीं हो पा रही है ! नेपाल से सटे तमाम जिलों जिनमे महाराजगंज,सिद्धार्थनगर,लखीमपुर खीरी प्रमुख हैं,से भारी मात्रा में खाद एवं अनाज आदि नेपाल सीमा पार भेजा जाता रहा है जिससे नेपाल के पहाड़ी इलाकों में लोगों का जीवन यापन होता है ! ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि खुलेआम चल रही ये आवाजाही क्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित है ? क्या इस आवाजाही पर सरकारी  अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए ?
                  भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा को लेकर हमारे पास कोई ठोस नीति नहीं हो पाने के कारण नेपाल सीमा, बाहर से आने वाले माओवादी संगठनो,अपराधियों,आतंकवादीयों के लिए सबसे आसान रास्ता बनती जा रही है और भारी संख्या में हथियार आदि की तस्करी की संभावना प्रबल होती जा रही है ! इसमे कोई दो राय नहीं कि बांग्लादेश एवं पाकिस्तान सीमा पर चौकस सुरक्षा इंतजाम होने के कारण तमाम वाह्य राष्ट्रविरोधी ताकते नेपाल के रास्ते भारत में घुसपैठ करने की कोशिश करती रही हैं या बहुत हद तक घुसपैठ कर पाने में सफल भी हो रही हैं,जिस पर नकेल कसने में हम नीतिगत रूप पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं ! भारत-नेपाल सीमा की कमजोर सुरक्षा नीति से  देश के आंतरिक एवं वाह्य सुरक्षा पर पडने वाले प्रभावों को अगर चीन एवं पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में  समझने का प्रयास करें तो इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए  कि चीन द्वारा नेपाल का इस्तेमाल भारत में आंतरिक अस्थिरिता का माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है या किया भी जा रहा है ! इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि नेपाल में राजशाही के खिलाफ माओवादी संघर्ष को शुरूआत से ही चीन का आंतरिक समर्थन प्राप्त था ! ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जब माओवादी दल सत्ता में भागीदार हो तो चीन भारत के खिलाफ अपने मकसद को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोडेगा ! दूसरी तरफ पाकिस्तान भी मावोवादी ताकतों का सहारा लेकर कहीं ना कहीं अपनी आतंकवादी गतिविधियों को नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाको में बढाने में हमेशा से प्रयासरत रहा है और भारी संख्या में आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल में होने वालीं सामग्री नेपाल के रास्ते भारत भेजी जाती रही हैं ! भारत में पहले से ही नक्स्लावाद एवं माओवाद एक आंतरिक संकट बना हुआ है ऐसे में अगर नेपाल सीमा से इन संगठनों को मदद पहुचती है तो निश्चित रूप से यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंता की बात है जिस पर सरकार को गंभीर होने की जरुरत है !
            आज जब पाकिस्तान,बांग्लादेश एवं चीन से लगी भारतीय सीमाओं को चौकस सुरक्षा इंतजामों से लैस किया गया है तो सवाल उठना लाजिमी है कि फिर नेपाल सीमा के साथ इस तरह का दोहरा रवैया क्यों ? इस संदर्भ में नेपाल के आंतरिक हालात को संज्ञान में लेते हुए  नेपाल-भारत सीमा पर भारत के विदेश मंत्रालय एवं एवं रक्षा मंत्रालय सहित गृह मंत्रालय को गंभीर होने की जरुरत है एवं सीमा सुरक्षा को लेकर द्विपक्षीय ठोस नीतियों को अमली जामा पहनाने  की जरुरत पर भी  बल दिया जाना चाहिए  ! अब्दुल करीम टुंडा एवं इन्डियन मुजाहिद्दीन के आतंकी भटकल के घुसपैठ से सबक लेते हुए  नेपाल-भारत सीमा सुरक्षा मसले पर आवाजाही के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुरूप नियम बनाने एवं उसके क्रियान्वयन पर ठोस नीति निर्माण की आवश्यकता है  ! नेपाल की लगभग पाँच सौ किलीमीटर में फैली सीमा को किस तरह से चाक चौबंद किया जाया इसके लिए भी आंतरिक सुरक्षा नीतियों सहित वाह्य सुरक्षा नीतियों को पुख्ता करने पर समय रहते ठोस कदम उठाये जाने चाहिए  ! नेपाल के आंतरिक राजनीति में बढते माओवादी हस्तक्षेप को मद्देनजर रखते हुए भारत को नेपाल-भारत सीमा की गंभीरता को समझना अत्यंत जरूरी है वरना नेपाल सीमा के प्रति नरम रुख देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं !

शनिवार, 24 अगस्त 2013

राजनीति के चौरासी कोस : डीएनए में प्रकाशित लेख



  •  शिवानन्द द्विवेदी सहर

यूपी की सियासत का चरित्र ही कुछ ऐसा है कि वहाँ धर्म और राजनीति एक दूसरे को किसी ना किसी रूप में प्रभावित करते ही रहते हैं ! नब्बे के दशक में हुए मंदिर आंदोलन के बाद से ही अगर यूपी की राजनीति का इतिहास उठाकर देखा जाय तो यूपी में धर्म का स्वरुप बेहद राजनीतिक नजर आएगा ! अब जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो एकबार फिर धर्म की राजनीति की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है ! विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर 25 अगस्त से प्रस्तावित अयोध्या में चौरासी कोसी यात्रा पर उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा लगाईं पाबंदी का मुद्दा अब केन्द्र की राजनीति का हिस्सा बन चुका है ! चुकि पारम्परिक रूप से यह मुद्दा ही केन्द्र की राजनीति का है क्योंकि यूपी के विधानसभा चुनावों के समय इस मुद्दे को ज्यादातर जोर पकड़ते नहीं देखा जाता है ! लिहाजा, इस मुद्दे पर भाजपा एवं कांग्रेस दोनों के बयान आने लाजिमी थे और आ भी चुके हैं ! स्वाभाविक रूप से भाजपा ने एक तरफ जहाँ इस यात्रा के प्रति उदारता दिखाते हुए तय नियमों के आधार पर इसको अनुमति देने की बात की है तो वहीँ कांग्रेस की तरफ से दिग्ग्विजय सिंह ने भाजपा और उत्तरप्रदेश सरकार दोनों पर सवाल खड़े कर दिये हैं ! बेशक विश्व हिंदू परिषद भारतीय जनता पार्टी की आधिकारिक उप इकाई ना हो लेकिन संगठनात्मक एवं वैचारिक स्तर पर उसका कार्य भाजपा के अनुकुल ही होता है ! अत: विहिप द्वारा घोषित इस यात्रा को गैर-राजनितिक तो नहीं ही कहा जा सकता है ! लोकसभा चुनाव के लिहाज से उत्तरप्रदेश प्रदेश सबसे ज्यादा यानी अस्सी सीटों वाला राज्य है एवं इसी राज्य के बदौलत भाजपा एक बार सत्ता तक पहुचने में सफल भी रही है ! अत: एक बार फिर भाजपा की नजर अपने उसी किले पर है जहाँ से चलकर उसे अपनी खोई मंजिल दिखाई दे रही है ! आज नरेंद्र मोदी जैसे हिन्दुवादी चेहरे को अगर भाजपा ने सबसे पुराने गठबंधन के टूटने की शर्तों पर आगे लाया है तो इसे भाजपा की प्री-इलेक्सन चुनावी कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए ना कि चुनाव के बाद की कवायदों के रूप में देखा जाय ! इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा में नरेंद्र मोदी सरीखा कोइ दूसरा नेता नहीं है जिसको आगे लाकर मुख्यधारा की बुनियादी राजनीति एवं धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण के बीच समन्वय स्थापित किया जा सकता हो ! नरेंद्र मोदी को लाने का एक बड़ा मकसद यही है कि नब्बे के दशक वाले उस पुराने राजनीतिक फार्मूले का उत्तर प्रदेश में दुबारा सूत्रपात किया जा सके ! आज अगर विश्व हिंदू परिषद द्वारा चौरासी कोसी यात्रा की बात की जा रही है तो यह ना सिर्फ विहिप का अभियान मात्र है बल्कि इसे भाजपा द्वारा यूपी में चुनावी एजेंडा तैयार करने की कवायदों के रूप में भी देखा जाना चाहिए ! आंकड़ों की गणित में सबको पता है कि अगर हिंदू ध्रुवीकरण के अपने पुराने सियासी फार्मूले में भाजपा सफल हो जाती है तो बेशक वो 272 का जादुई आंकड़ा ना जुटा पाए लेकिन सबसे बड़े राजनीतिक  दल के रूप में उभर कर तो सामने आ ही सकती है ! इस ध्रुवीकरण का डर ही है कि हाल ही में कांग्रेस आलकमान ने अपने सभी मुस्लिम नेताओं को सख्त हिदायत दी कि मोदी के खिलाफ कम से कम अथवा ना के बराबर बोला जाय ! इस बात को कोंग्रेस बेहतर जानती है कि मुस्लिम ध्रुवीकरण के नाम पर अगर समाजवादी पार्टी यूपी में बहुमत जुटा सकती है तो हिंदू ध्रुवीकरण के नाम पर मोदी केन्द्र में भी पहुच सकते हैं ! लिहाजा, कांग्रेस द्वारा इस मसले पर कुछ भी एकतरफा नहीं बोला जा रहा है ! गौर करने वाली बात ये है कि हमेशा तुष्टिकरण और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली कांग्रेस, विहिप द्वारा प्रस्तावित चौरासी कोसी यात्रा पर कुछ भी स्पष्ट बोलने से बचती नजर आ रही है ! कांग्रेस की उहापोह और भाजपा द्वारा विहिप के इस्तेमाल के बीच मुलायम सिंह यादव द्वारा इस यात्रा का विरोध किये जाने के पीछे का मकसद साफ़ है कि वो किसी भी हाल में अपना मुस्लिम वोटबैंक खिसकने नहीं देना चाहते हैं ! मुलायम बेशक खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की ख्वाहिश रखते हों लेकिन इतना तय है कि केन्द्र में उनकी स्थिति एक सहयोगी क रूप में ही रहेगी अत: वो केन्द्र की राजनीति के नाम पर राज्य के राजनितिक समीकरणों के साथ छेड़-छाड करने का जोखिम नहीं ले सकते ! मुलायम को इस बात का अंदाजा है कि उत्तर प्रदेश में अगर हिंदू ध्रुवीकरण हो भी जाता है जो कि बेहद मुश्किल है, तो इसका खामियाजा कांग्रेस को ही उठाना पड़ेगा ! चुकि मोदी का हिंदू ध्रुवीकरण ही मुलायम के मुस्लिम ध्रुवीकरण को और पुख्ता कर सकता है, अत: उनको इससे बहुत नुकसान होता नहीं दिख रहा ! हालाकि उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक  परिवेश में हिंदू ध्रुवीकरण होना बहुत आसान नहीं लगता,क्योंकि हिंदू समुदाय के वोट अब जातिगत समीकरणों पर बट चुके हैं,जिन्हें जाति से हटाकर धर्म के नाम पर डायवर्ट करना लोहे चने चबाने से से कम नहीं है ! मंदिर और धार्मिक यात्राओं के नाम पर मोदी का चेहरा आगे कर देने से अगर वाकई यूपी में हिंदू ध्रुवीकरण की कुछ संभावनाए खुलकर सामने आती हैं और वोटर्स का रुझान इधर से उधर होता है,तो इसका सीधा लाभ भाजपा को जरुर मिलेगा ! हिंदू ध्रुवीकरण की संभावना की आह लेने और इसको पुख्ता करने के लिए मोदी के खासमखास अमित शाह को यूपी की कमान दी गयी है !
     फिलहाल वर्तमान हालातों में चुनौतियाँ सबके सामने हैं और सब अपने-अपने सहूलियत की राजनीति करते नजर आ रहे हैं ! भाजपा द्वारा मोदी और अमित शाह के बहाने विहिप को ढाल बनाकर जातिगत समीकरणों में सेंध लगाने एवं धर्म के नाम पर वोट जुटाने की कवायद की जा रही है तो वहीँ सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी भी भी अपनी धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति को और ठोस और मजबूत बनना चाहती है ! यूपी की राजनीति में धर्म के नाम पर राजनीति करने का ठीकरा सिर्फ भाजपा पर फोडना निहायत अतार्किक बात होगी ! सही बात तो ये है कि यूपी में धर्म और जाति के नाम पर ही राजनीति होती है और लगभग सभी राजनीतिक दल किसी ना किसी धर्म और जाति की राजनीति करते हैं ! बेशक भाजपा का राजनितिक धर्म कोइ और हो और सपा और कांग्रेस का कोई और हो !  फिलहाल चौरासी कोसी यात्रा को रोके जाने और इस पर भाजपा की आपत्ति एवं कांग्रेस की तटस्थता की स्थिति के बीच एक बात साफ़ तौर पर सामने आती दिख रही है कि यूपी में लोकसभा चुनाव फिर डेढ़ दशक पुराने कसौटियों पर लड़े जाने हैं और लड़े जायेंगे ! इसका परिणाम अब जो भी हो  आगाज का अंदाज तो वही पुराना है !! 
         

बुधवार, 21 अगस्त 2013

इन हादसों की जिम्मेदारी किसकी : नई दुनिया में प्रकाशित लेख



  • शिवानन्द द्विवेदी सहर 

बिहार के समस्तीपुर-सहरसा रेलखंड के बीच हुए रेल हादसे में 37 लोगों के मारे जाने एवं सैकड़ों लोगों के हताहत होने की ख़बरों के बाद यह सवाल फिर से उठ रहा है कि अक्सर होते रहने वाले इन हादसों के लिए दोषी किसे माना जाय ? हालाकि हमेशा ऐसा देखा जाता है कि ऐसे रेल हादसों के बाद प्रतिक्रिया स्वरुप उग्र भीड़ द्वारा रेलगाड़ी में आग लगा दी जाती हैं एवं तोड़-फोड़ आदि की जाती है ! वहीँ दुसरी तरफ रेल मंत्रालय एवं राज्य सरकारों की तरफ से जांच एवं मुआवजे की घोषणा करके मामले को ठंढे बस्ते के हवाले कर दिया जाता है ! लेकिन ऐसे हादसों के मूल वजहों को तलाशने एवं उसकी सुधार की दिशा में शायद ही कोई पहल अबतक की गयी हो अथवा अगर की भी गयी हो तो किसी परिणामी निष्कर्ष तक पहुची हो ! अगर देखा जाय तो हादसों के इन मामलों में ज्यादातर गुस्सा सरकारों एवं विभागों के प्रति ही दिखाया जाता है एवं पुरे हादसे का ठीकरा प्रशासन पर ही फोड़ने की कोशिश की जाती है ! लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि ऐसे हादसे केवल प्रशासन एवं विभाग की लापरवाही से ही होते हैं ! कई बार ऐसे हादसे जनता के गैर-जिम्मेदाराना और लापरवाह हरकत की वजह से भी होते हैं ! बिहार में हुए इस वीभत्स हादसे के पीछे भी कहीं ना कहीं वो भी कम दोषी नहीं नजर आ रहे जो इस आज इस दुर्घटना में या तो जान गवा चुके हैं अथवा हताहत हैं ! पिछले कुछ सालों में हुए हादसों पर नजर डालें तो ज्यादातर हादसे ऐसे हैं जो भीड़ के अन्धुत्साह के कारण होते रहे हैं ! चुकि, बहु समुदायों का देश होने के नाते भारत विभिन्न तरह की उत्सवधर्मिताओं का देश है,जहाँ लगभग हरदम किसी ना किसी तरह का लंबे समय तक चलने वाला उत्सव अथवा पर्व आता ही रहता है ! ऐसे उत्सवों अथवा पर्वों में शरीक होने लाखों-करोंडो की संख्या में लोग देश के कोने-कोने से पहुचते हैं ! इस लिहाज से अगर देखा जाय तो इस बार हुआ यह बिहार रेल हादसा सावन महीने के कांवड यात्रा के समय में हुआ है ! यह कोई नयी बात नहीं है कि कांवड़ यात्रा के नाम पर जहाँ एक बड़ा समुदाय अपनी आस्था के कारण मंदिरों में जल चढाने जाता है तो वहीँ इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि भारी संख्या में उत्पाती किस्म के लोग भी इस दर्शन के नाम पर जत्थे में शामिल होते हैं और उत्पात मचाते हैं ! देश की राजधानी दिल्ली तक  में इन कांवडियों की मनमानी सरेआम देखी जा सकती है तो अन्यत्र की बात ही क्या की जाय ! बिहार में हुआ यह हादसा भी कुछ इसी तरह की जनता की मनमानी का नतीजा है ! सवाल है कि क्या जो लोग इस हादसे में जान गवाए हैं अथवा घायल हुए हैं,उनको नहीं पता था कि रेल पटरी पर चलना खतरे को बुलावा देना है ? क्या धार्मिक यात्राओं का उत्साह किसी को भी इस बात की छूट देता है कि वो तय नियामकों को तोड़कर अपनी मनमानी करे ? प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ बिहार में हुए इस हादसे की सबसे बड़ी वजह यही है कि लोग रेलगाड़ी आने से लापरवाह पटरी पर चल रहे थे ! ऐसे हालात में जब ट्रेन आने से बेपरवाह लोग पटरी पर चल रहे हों तो रेल प्रशासन द्वारा हर जगह रेल हादसे टाल पाना बेहद मुश्किल है ! गौरतलब है कि उसी दिन किउल-मोकामा रेलखंड पर एक हाल्ट पर तेज रफ़्तार की गाड़ी जनशताब्दी के ड्राइवर के प्रयासों से सैकड़ों उन लापरवाह किस्म के लोगों को बचाया जा सका जो कि रेलवे ट्रेक पर बैठकर ट्रेन आने का इन्तजार कर रहे थे  ! इस पुरे मामले में जनता की लापरवाही एवं मनमानेपन को एक बड़ी वजह के रूप में देखा जाना चाहिए जो कि एक तरह से अपराध की श्रेणी में भी आता है ! आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछले तीन साल में  लगभग 41000 से ज्यादा लोग ट्रेन पटरी पर हुए हादसों में मारे गए हैं जबकि प्रत्येक साल 15000 लोग बेपरवाह रेलवे ट्रेक पार करते हुए जान गवाएं हैं ! चुकि रेल पटरी पर चलना एक जुर्म है अत: यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि रेलवे ऐसे अपराधों पर नियंत्रण के क्या प्रयास कर रही है ! आंकड़ो के अनुसार 1,61,192 लोगों को केवल साल 2011 में इस वजह से गिरफ्तार किया गया क्योंकि वो रेल पटरी पर चल रहे थे ! अत: ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि रेलवे द्वारा इस अपराध पर नकेल कसने को लेकर बिलकुल गंभीरता नहीं बरती जा रही है ! हाँ, कई ऐसे मोर्चे हैं जहाँ रेल विभाग को भी व्यापक स्तर पर सुधार करने की जरुरत है एवं हमारी रेलवे अभी भी वहाँ पिछडी हुई है ! रेलवे की खामियों पर अगर नजर डाले तो अभी भी पन्द्रह हजार से ज्यादा रेलवे क्रासिंग ऐसे हैं जो मानवरहित हैं एवं सौ के आस-पास रेलवे प्लेटफोर्म पर लाउडस्पीकर से सुचना देने की सुविधा तक नहीं है ! इस बात को
स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि अभी तकनीकी स्तर पर हमारा रेलवे उतना विकसित नहीं हो पाया है जितने की जरुरत है, लेकिन रेलवे की इन खामियों को ही केवल हादसों की वजह बता देना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता ! सवाल है कि क्या हम अपने जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तकनीकी के ऊपर ही देंगे ? क्या हम आत्मसुरक्षा एवं नागिरक जवाबदेही के प्रति कभी सजग नहीं होगें ? यहाँ पूरा का पूरा मामला नागरिक जवाबदेही का है एवं बजाय कि ऐसे हादसों का ठीकरा रेलवे एवं अन्य विभागों पर फोड़ने के,हमें अपने गिरेबान में झांक कर देखना होगा कि हम कितने सही और जावबदेह हैं ! विभागों एवं सरकारों का क्या है, वो तो आपकी मौत पर मुआवजे और जांच का ठप्पा मार कर पुरे मामले को ही रफा दफा कर देने का अनोखा फार्मूला इजाद कर चुके हैं और इसका प्रयोग वो बेहिचक करते भी रहते हैं ! ऐसे हादसों के होते ही एक दूसरे के ऊपर छींटा-कशी, आरोप-प्रत्यारोप करके अपनी राजनीति साधने के अलावा हमारे नेताओं को सूझता भी क्या है ! मगर यहाँ सवाल आपकी जान का है और अपनी जान की सुरक्षा के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील आपको ही रहना पड़ेगा ! एक लापरवाह, गैर-जिम्मेदार नागरिक जो ना तो अपनी नागरिक जवाबदेही की समझ रखता हो और ना ही अपनी सुरक्षा का ,उसको भला इस बात का हक कैसे मिल सकता है कि वो अपने मौत अथवा घायल होने का ठीकरा किसी और के सर फोड़े और सवाल पूछे ! ऐसे हादसों से बचने के लिए सबसे पहले जनता के अंदर सुधार होने की जरुरत है क्योंकि ऐसे हादसों की मूल वजह जनता की लापरवाही एवं उनका नियामकों के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया ही है ! अत: सबसे पहले हमें खुद इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी !!