रविवार, 30 दिसंबर 2012

सेहत से खिलवाड़ :जनसत्ता में प्रकाशित लेख



(30 दिसंबर)
सुखी और समृद्ध जीवन यापन में स्वास्थ्य के महत्व को किसी भी प्रस्तावना या परिचय की दरकार नही होती ! स्वस्थ व्यक्तियों का समूह ही स्वस्थ समाज के निर्माण में प्रमुख कारक होता है और स्वस्थ समाज से ही समृद्ध राष्ट्र का निर्माण संभव है ! आज भारत में स्वास्थ्य एक ऐसा  विषय है जिस पर कहने और दिखाने को तो सरकारी आंकड़ों में बहुत कुछ मिल जायेगा लेकिन वास्तविकता के धरातल पर जाकर देखा जाय तो मामला ढाक के तीन पात से ज्यादा कहीं नहीं ठहरता ! जीवन का अधिकार बेशक हमारे मूल अधिकारों का सबसे मजबूत पहलू है लेकिन आज तक हम यह नहीं निर्धारित कर पाए कि इस अधिकार के तहत जीवन जीने वाले नागरिकों का जीवन हो तो कैसा हो ? बुनियादी सवाल ये है कि क्या राईट टू लाइफ के दायरे में उन बहुसंख्यक बीमार,अस्वस्थ जीवन जी रहे व्यक्तियों को भी रखा जा सकता है जो किसी ना किसी कारण से स्वस्थ जीवन जीने से महरूम है ? स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अगर किसी की मौत होती हो तो क्या इससे राईट टू लाइफ की प्रासंगिकता पर सवाल नहीं उठते ? सवाल ये भी है कि क्या किसी व्यक्ति का किसी भी हालात में  जिन्दा रहना मात्र ही उसे राईट टू लाइफ के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त मानक है ; या जीवन के इस अधिकार के तहत जीने वाले समाज के व्यक्तियों के जीवन यापन के और भी मानक होने  चाहिए ? स्वास्थ्य को लेकर भारत में हालात विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा तुलनात्मक रूप से बेहतर नहीं रहे हैं ! गौर करना होगा कि स्वास्थ्य के प्रति संजीदा होने के मामले में हम अपने निकटतम पड़ोसी मुल्क चीन से काफी पीछे नजर आते हैं ! चीन में स्वास्थ्य पर उसके कुल सकल घरेलु उत्पाद का पाँच प्रतिशत खर्च किया जाता है जबकि भारत सरकार कुल जी डी पी का मात्र एक प्रतिशत ही स्वास्थ्य के नाम पर खर्च करती  है, जो कि भारत में  स्वास्थ्य की वर्तमान जरुरतों  के हिसाब से नाकाफी साबित हो रहा है ! अगर बीमारियों एवं बीमारों के नजरिये से भारत की तुलना अन्य देशों से करें तो भी हमारी स्थिति खस्ता हाल ही नजर आती है और हम सर्वाधिक बीमारों वाले देशों की फेहरिश्त में उपरी पायदान पर खड़े नजर आते हैं ! चाहे एनीमिया रोग से मरने वाली महिलाओं की संख्या को देखा जाय या निमोनिया और डायरिया से मरने वाले बच्चो की संख्या पर नजर डाली जाय ,हम पुरे विश्व को मात देते अग्रिम कतार में खड़े आसानी से दिख जाते हैं !यूनिसेफ द्वारा दिये एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में निमोनिया एवं डायरिया से हुई एक साल में कुल २१ लाख बच्चों की मौतों में से सर्वाधिक ६ लाख बच्चों की मौतों के साथ भारत ७३ देशों की सूची में शीर्ष पर रहा !पिछले साल आये एक दूसरे सर्वे के मुताबिक़ भारत में खसरा से मरने वालों की संख्या पुरे विश्व में खसरा से हुई कुल मौतों की  ४७% है जो कि भारतीय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्यंत ही चिंताजनक है ! स्वास्थ्य के मामले में हमारे देश की आंतरिक बदहाली की फेहरिश्त यहीं खतम नहीं होती बल्कि तमाम और भी आंकड़े हैं जो स्वास्थ्य के प्रति हमारे सरकार के बीमार रवैये को दिखाते हैं ! आज एक तरफ जहाँ  हम प्रति एक हजार की जनसँख्या पर एक चिकित्सक तक उपलब्ध करा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं  तो वहीँ दूसरी तरफ  रोगियों की संख्या के अनुपात में चिकित्सकीय संसाधनो भारी का अभाव देखने को मिलता है ! औसत उम्र के मामले में  हमारी स्थिति बांग्लादेश से भी गयी गुज़री है !
स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदहाली को दिखा रहे इन आंकडो के आधार पर अगर हम इनकी खामियों पर नजर डाले तो बुनियादी तौर पर कुछ ऐसे तथ्य सामने आते है जो भारत की स्वास्थ्य नीति को ही सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं !स्वास्थ्य के परिप्रेक्ष्य में सबसे पहले इस तथ्य को देखना जरूरी है कि स्वास्थ्य को लेकर हमारे तंत्र का दृष्टिकोण किस तरह का है ? क्योंकि,पिछले कुछ सालों में बेशक हमारा तंत्र स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई ठोस कामयाबी हासिल नहीं कर पाया हो सिवाय पोलियो ड्रॉप पिलाने के, लेकिन चिकित्सा का निजीकरण धड़ल्ले से हुआ है ! सरकारी अस्पतालों की तुलना में जिस तरह से आधुनिक चिकित्सकीय संसाधनों से संपन्न निजी अस्पतालों का विकास तेजी से हो रहा है इसे भारतीय स्वास्थ्य के नजरिये से विकास का मानक  समझना हमारी भूल के सिवा कुछ भी नही है ! शायद हमारा तंत्र इस बात को भुल रहा है कि स्वास्थ्य हमारे  मुख्यधारा के जीवन से जुड़े राईट टू लाइफ से सीधा सरोकार रखने वाला विषय है एवं इस देश के हर नागरिक के जीवन को स्वस्थ रखने का दायित्व हमारे सरकार के कन्धों पर है ! राईट टू लाइफ से सीधे तौर पर जुड़े स्वस्थ जीवन के मसले को चिकित्सा के क्षेत्र में खड़े हो रहे महंगे बाजारों के भरोसे छोड़ दिया जाना, कहीं ना कहीं जीवन जीने के मूल अधिकार पर सवालिया निशान खड़ा करता है ! आज चिकित्सा में बढते निजीकरण का ही प्रभाव है कि चिकित्सा जन सरोकारी विषय ना रह कर बाजार का विषय बनती जा रही है ! आज गिने-चुने सरकारी अस्पतालों के हालात इस बात की गवाही देते हैं कि निजी अस्पतालों के बढते बाजार ने व्यक्ति के मूल अधिकार से जुड़े इस विषय को हाशिए पर ला दिया है ! दवाइयों जैसी मूल जरुरत की चिकित्सकीय सामग्रियों पर मुनाफे का ऐसा बड़ा बाजार खड़ा किया गया है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्वस्थ रहने की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है ! आज मजह ७४ दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकार का नियंत्रण है जबकि बाक़ी दवाओं पर कंपनियों द्वारा मनमानी तरीके से मूल्य थोपे जाते हैं और मरीजों को इन दवाओं के लिए भारी कीमत चुकानी पडती है ! दवाओं में मुनाफा कमाने का आलम यह है कि कंपनी से स्टाकिस्ट और रीटेलर तक जाते जाते दवाओं के दाम अपनी कंपनी कॉस्ट से बहुत ज्यादा हो जाते हैं ! सरकारी नियंत्रण से मुक्त एवं बेपरवाह ये दवा कम्पनियाँ अपनी मनमर्जी की कीमते रख कर भारी मुनाफा कमा रही हैं जबकि गरीब जनता स्वास्थ्य की बदहाली का जोहमत झेलने को मजबूर हो रही है ! हालाकि नई दवा नीति की मंजूरी के बाद कुल ३४८ दवाओं के कीमतों को सरकारी नियंत्रण में होने की बात की गयी है जिनका मूल्य निर्धारण सरकार कर सकेगी ! लेकिन यह फैसला इन बाजार के तानाशाहो के आगे कितना व्यवहारिक होगा ये तो वक्त ही बताएगा ! सरकारी अस्पताल, सरकारी मेडिकल कॉलेज ,सरकारी चिकित्सक का प्रबंध तो सरकार द्वारा किया जाता है लेकिन सरकारी मेडिकल स्टोर कहीं भी देखने नहीं मिल सकते जहाँ से आम मरीज सस्ते और सरकारी दरों पर दवाइयां खरीद सके !स्वास्थ्य के संकट से जूझ रहे इस गरीबों के देश में दवाओं के सरकारी स्टोर के ना होने और सरकार द्वारा निजी कंपनियों को दवाएं  बेचने की खुली छूट देने को अगर चिकित्सा का बाजारीकरण कहना कहीं से भी अप्रासंगिक नहीं प्रतीत होता ?
      स्वास्थ्य जैसी बुनियादी और व्यक्ति के जीवन से जुड़ी समस्या को लेकर अगर हमारी सरकार इस तरह से बेपरवाह काम कर रही है तो निश्चित तौर पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार से जोड़कर देखने की बजाय इसे स्वतंत्र रूप से एक मूल अधिकार का स्वरूप दिये जाने की जरुरत है ? क्या स्वास्थ्य को हर नागरिक के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ? क्या ऐसा नहीं लगता कि जीवन जीने के अधिकार के साथ साथ हर व्यक्ति को स्वस्थ रहने का भी अधिकार है और सरकार का यह दायित्व है कि वह सीधे तौर पर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य हितों पर काम करे बजाय कि निजी कंपनियों का सहारा लेकर ? आज जरुरत इस बात पर बल देने की है कि अन्य मूल अधिकारों की तरह जनता को स्वस्थ रहने का अधिकार भी संवैधानिक रूप से दिया जाना चाहिए  बेशक इसके लिए सरकार को चिकित्सा में सब्सिडी बढानी पड़े ! क्योंकि स्वस्थ समाज में ही विकास की संभावनाए पलती हैं जबकि बीमार समाज राष्ट्र को लाचार और कमजोर बनाता है !!

शिवानन्द द्विवेदी “सहर”


रविवार, 23 दिसंबर 2012

कहाँ महफूज है देश की आधी आबादी : अप्रकाशित लेख





देश के सबसे सुरक्षित शहर के रूप में मशहूर राजधानी दिल्ली भी महिलाओं को सुरक्षा दे पाने में लागातार नाकाम साबित हो  रही है ! आधी दुनिया के नाम से जानी जाने वाली महिलायें अगर दिल्ली कि सड़कों पर खुद को सुरक्षित नहीं महसुस कर पा रहीं तो देश के बाक़ी जगहों में महिलाओं की स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ! एक ताजा घटना में दिल्ली के ही मुनारिका इलाके में रात को एक लड़की के साथ बलात्कार की घटना सामने आई जिसने ना सिर्फ हमारी सुरक्षा व्यवस्था बल्कि तमाम सामाजिक पहलुओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है ! असम से लेकर दिल्ली तक जिस तरह से महिलाओं एवं लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ और बलात्कार के सिलसिलेवार मामले एक के बाद एक सुर्ख़ियों में आते रहे हैं,ने क़ानून व्यवस्था के साथ-साथ इस बात पर सवाल उठाये हैं कि आखिर हमारा भारत किस संस्कृति की तरफ जा रहा है ? क्या हम इतने बदन पिपाशु हो चुके हैं कि सामाजिक संवेदनाए हमारे लिए मायने नहीं रखती या कहीं ना कहीं कोई ऐसा कारक है जो  समाज की वर्तमान पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर रहा है ! अगर आंकड़ो पर गौर करें तो पिछले कुछ सालों में बलात्कार  की घटनाओं में लागतार इजाफा देखने को मिला है ! इस बावत अगर राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के द्वारा जारी किये गए आंकड़ों पर नजर डाली जाय तो भारत में प्रतिदिन ५० महिलाओं के साथ बलात्कार की घटानाओं को अंजाम दिया जाने की बात सामने आती है ! वही एक अन्य आंकड़े में ऐसा बताया गया है कि भारत में बलात्कार के ग्राफ में  २९.७ प्रतिशत की रफ़्तार से प्रतिवर्ष  वृद्धि हो रही है जो कि देश की अस्मिता को शर्मसार करने वाला आंकड़ा है ! सन २०१० की अपेक्षा सन २०११ में लगभग बलात्कार के दो हजार मामले ज्यादा सामने आये और एक अनुमान के मुताबिक़ सन २०१२ में इसमें और इजाफा होने की संभावना जताई जा रही है ! इन सभी आंकड़ों में सबसे चौकाने वाली बात तो यह है कि बलात्कार की कुल घटनाओं में सबसे ज्यादा मामले दिल्ली में सामने आये हैं ! आंकड़ो के आधार पर राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा दिये गए निष्कर्ष में ऐसा बताया गया कि भारत में हर ५७ मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार होता है ! निश्चित तौर पर ये आंकड़े देश में महिलाओं कि स्थिति एवं उनके प्रति असंवेदनशील होते समाज एवं लचर प्रशासनिक व्यवस्था को दिखाने के लिए पर्याप्त हैं !
      बेलगाम होती बलत्कार की घटनाओं एवं निडर घूम रहे इन बदन पिपाशुओं पर नियंत्रण कैसे पाया जाय, ये सवाल आज भी ना सिर्फ प्रशासन बल्कि समूचे समाज के लिए चुनौती बना हुआ है !जाने किस अंधविश्वास में बहक कर समाज के ये अराजक तत्व ये भुल रहे हैं कि  महिलाओं का भी समाज निर्माण में समानांतर योगदान होता है या कई मामलों में दो कदम आगे की भूमिका होती है ! एक तरफ जहाँ महिलाओं के लिए देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में निर्धारित भूमिका तय करने की बात की जा रही है वहीँ दूसरी तरफ महिलाएं अपने घरों,सडकों पर ही महफूज नहीं है और समाज का एक तबका उसे महज एक साधन मात्र के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है ! आये दिन हो रही बलात्कार की सरेआम घटनाओं पर हमें ना सिर्फ कानूनी तौर पर बल्कि सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक तौर पर और अधिक सजग एवं विकसित होने की जरुरत है ! आज हमें उन कारणों को तलाशने पर ज्यादा बल देना होगा जो समाज को गलत दिशा में ले जाने के लिए उत्तरदायी हैं ! अलग अलग समाजशास्त्रियों द्वारा बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के पीछे तमाम अलग अलग कारण बताये गये हैं ! कुछ समाजविदों का मानना है कि पश्चिमी संस्कृति के प्रति स्त्रियों एवं पुरुषों दोनों में बढ़ता असंतुलित एवं अनावश्यक आकर्षण भी बलात्कार को बढ़ावा देने में एक प्रमुख कारक है ! वहीँ तमाम समाजवेत्ताओं  द्वारा इसके पीछे नशीली पेय या खाद्य पदार्थों पर नियंत्रण ना होने को एक वजह के तौर पर माना जाता रहा है ! हालाकि बलात्कार के मसले को कई बार मनोवैज्ञानिकों द्वारा मानसिक  रोगों से जोड़ कर भी देखने का प्रयास किया गया है एवं कुछ मामलों में मानसिक स्थिति को वजह के रूप में भी दिखाया भी गया है ! इन तमाम वजहों के अलावा अगर देखा जाय तो एक वजह यह भी सामने आती है कि बलत्कार को लेकर हमारी प्रशासनिक पद्धति एवं न्यायायिक प्रक्रिया कहीं ना कहीं नाकाफी साबित हो रही है जिससे इस घृणित अपराध पर काबू नहीं पाया जा सका है !
हालाकि ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता कि बढते बलात्कार के मसले पर हमारा तंत्र पूरी तरह से बेपरवाह है ! इस संदर्भ में सरकार के तीनो अंगों,व्यवस्थापिका ,कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के तरफ से हमेशा संज्ञान लिया जाता रहा है लेकिन बावजूद इसके अभी तक कोई ठोस उपाय नहीं तलाशा जा सका है, जिससे बलात्कार के रफ़्तार पर लगाम कसा जा सके ! बलात्कार पर लगाम कसने सम्बन्धी कई ऐतिहासिक निर्णय न्यायपालिका द्वारा लिए गए हैं जिसमे दशकों पहले धनंजय चटर्जी की फांसी की सजा को उदाहरणार्थ देखा जा सकता है ! इसके अलावा भी कई मसलों पर न्यायपालिका द्वारा बलात्कार पर नियंत्रण कसने के सुझाव दिये जाते रहे हैं जो अगर अमल में लाये जाय तो हम काफी हद तक अपने उद्देश्यों में  कारगर हो सकते हैं !
      आये दिन बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं को समाज के मुख्य धारा का विषय मानते हुए आज इसके नियंत्रण के हर संभव उपायों को अमल में लाये जाने की जरुरत है ! एक संतुलित न्यायिक,प्रशासनिक एवं सामाजिक जवाबदेही के तहत इस बात को समझने की जरुरत है कि तमाम उपायों को व्यव्हार में कैसे लाया जाय ? इस संदर्भ में बलात्कार के मसलों को सुलझाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के पुख्ता इंतजाम करने के साथ-साथ मामलों के निपटारों में शीघ्रता लाने एवं दंड के प्रारूप में भी बदलाव लाने की जरुरत है !आज जब  बलात्कार के आरोपी को जेल तक की सजा देने से मामला बनता नहीं दिख रहा तो उन दंड नीतियों पर भी अमल किया जाना चाहिए जिससे बलात्कारी के अंदर सामाजिक प्रायश्चित एवं ग्लानि का भाव उत्पन्न हो और वो समाज के सामने अपने किये पर प्रायश्चित करे ! इस मामले में रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से बलात्कारी को नपुंसकता की स्थिति में लाने की बात को भी दंड प्रावधान में शामिल किये जाने की हिमायत समय समय पर होती रही है !साथ ही साथ तमाम तमाम मनोवैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से इन घटनाओं के प्रति समाज में जागरूकता लाने की जरुरत पर बल दिये की बात की जाती रही है, जिन्हें अमल में लाये जाने की जरुरत है ! बढते बलात्कारों के वारदातों पर सजग होकर केवल क़ानून एवं प्रशासन पर निर्भर होने के बजाय इस समस्या के प्रति समाज को खुद गंभीर होने एवं अपनी जावबदेही तय करने की जरुरत पर भी बल देना होगा ! समाज का आम नागरिक जब तक इस घृणित अपराध से खुद को जोड़ कर नहीं देखेगा तब तक ये घटनाएं  महज कानूनी मसला बनकर फाइलों और न्यायालयों में हिलोरें मारती रहेंगी,और बलात्कारियों का हौसला बुलंद होता रहेगा ! अत: महिलाओं की अस्मिता एवं समाज के लिए कलंक बन चुके  इस विषय पर समाज,क़ानून,प्रशासन सबको एक साथ सजग होने की जरुरत है ना कि सब अपनी ढपली अपना राग बजाएं !!


शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

एफ डी आइ का दिखावटी विरोध : दैनिक जागरण में प्रकाशित





एफ.डी.आइ को लेकर संसद के शीतकालीन सत्र में चल रही गहमा-गहमी आखिरकार सत्ता पक्ष की जीत और विपक्ष की हार के साथ खतम हुई ! एफ.डी.आइ के पक्ष में पड़े २५३ वोटों के मुकाबले एफ.डी.आइ के विरोध में पड़े २१८ सांसदों का समर्थन इस विधेयक की मंजूरी को रोक पाने में कामयाब नहीं हो सका ! राजनीतिक भाषा में अगर कहा जाय तो एफ.डी.आइ के मसले पर सरकार अपने संख्याबल को साबित करने में कामयाब रही ! हालाकि इस पुरे मामले में महीनो से चल रही नूराकुश्ती में वोटिंग के बाद कई सियासी चेहरे बेनकाब होते भी नजर आये हैं ! वोटिंग के बाद दोहरे चरित्र का नकाब उन सियासी पहरेदारों के चेहरे से भी उतरा है जो कल तक एफ.डी.आइ के विरोध में सड़क से संसद तक ताल ठोकते नजर आ रहे थे और इसे किसान विरोधी,जन- विरोधी और जाने क्या क्या बताते नहीं अघा रहे थे ! लोकसभा में नियम १८४ के तहत हुई चर्चा में ऐसा अंदेशा पहले से ही लगाया जा रहा था कि सरकार लोकसभा में इस बिल को  पास कराने में कामयाब हो जायेगी ! क्योंकि सरकार बिना अंदरूनी गठजोड़ और सियासी प्रबंधन किये नियम १८४ के तहत चर्चा को कभी नहीं स्वीकार करती ! संसद के निचले सदन में जो भी हुआ वो काफी हद तक पूर्वनियोजित था और सबकुछ सरकार द्वारा प्रबंधित किया गया था ! अब जब लोकसभा में एफ.डी.आइ पास हो चुका है तो इसके जनहितैषी होने या जनविरोधी होने पर बहस करने की बजाय बहस इस बात पर होनी चाहिए कि एफ.डी.आइ के मसले पर किस दल का चरित्र किस रूप में उभर कर सामने आया है ? आज बहस संख्याबल और आंकड़ों की भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि आंकड़ों की गणित को सरकार किस तरह मैनेज कर लेती है यह  जग जाहिर हो चुका है ! अगर आप भूले नहीं हो  तो ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो कुछ ही महीनो पहले एफ.डी.आइ के विरोध में बी.जे.पी के भारत बंद में साथ खड़े नजर आये तो वही संसद में बहस के प्रथम दिन अपने भाषण में एफ.डी.आइ को किसान विरोधी एवं जन विरोधी बताते हुए सरकार से वापस लेने की अपील करते दिखाई दिये ! लेकिन सियासत में गिरगिट से भी तेज रंग बदलने की परम्परा में नई कड़ी जोडते हुए मुलायम सिंह यादव एवं उनकी समाजवादी पार्टी ने जिस तरह से लोकसभा से बायकाट किया वो उनके दोहरे चरित्र की सियासत को जनता के सामने बेनकाब करने के लिए पर्याप्त है ! मुलायम सिंह यादव द्वारा  लोकसभा से बायकाट करने की  वजह जनता की बीच  चाहे जो भी बताई जाय लेकिन उनको इतना तो समझना ही होगा कि देश की जनता अब अंकगणित के मामले में इतनी कमजोर भी नहीं कि उनके बायकाट का मतलब ना समझ पाए ! बेशक समाजवादी पार्टी ने एफ.डी.आइ के पक्ष में वोट नहीं दिया लेकिन इसको किसी भी दृष्टिकोण से  एफ.डी.आइ का  विरोध कहना बेमानी लगता है ! मुलायम सिंह यादव द्वारा संख्याबल के निगेटिव मार्किंग की ऐसी सियासी चाल चली गयी कि सरकार अपने मंसूबे में कामयाब भी रही और मुलायम विरोध करते हुए भी सरकार के लिए फायदेमंद साबित हुए ! हालाकि इस रंग बदलने की सियासत में सी.बी.आइ फैक्टर को  एक अहम कारण के रूप में देखा जा सकता है, साथ ही इसमें मुलायम सिंह यादव के भावी सियासी गठजोड़ के गुणाभाग को भी नकारा नहीं जा सकता ! मुलायम को यह बखूबी पता है कि सरकार के खिलाफ जाने पर सी.बी.आइ का जिन्न मुह बाए निगलने को तैयार बैठा है तो वहीँ भविष्य में उनकी कोई भी सियासी महत्वाकांक्षा बिना कांग्रेस के समर्थन के पूरी होती नहीं दिख रही ! सी.बी.आइ का डर और सियासत में स्वार्थसिद्धि की महत्वाकांक्षा ने इस धरती पुत्र को लोकसभा से बायकाट करने पर मजबूर कर दिया ! बेशक एफ.डी.आइ बिल लोकसभा में पास हो गया हो लेकिन साथ ही साथ मुलायम सिंह यादव एवं उनकी पार्टी के दोहरे चरित्र की राजनीति का एक कुरूप चेहरा भी जनता के सामने उभर कर आ चुका है ,बेशक समाजवादी पार्टी अपने बचाव में कोई भी दलील दे !
जैसी स्थति मुलायम सिंह यादव की रही कमोबेश कुछ वैसी ही स्थिति बसपा सुप्रीमो मायावती की भी रही ! यू.पी में एक दूसरे की रीतियों-नीतियों के धुर विरोध की सियासत करने वाली दो प्रमुख पार्टियां किस तरह केन्द्र में समान नीति अख्तियार करते हुए अपना रंग बदलती हैं और आर-पार की लड़ाई से मुह मोड़कर सदन से बायकाट करती हैं, स्वार्थ की सियासत का यह समझौता आज देश की जनता के सामने साफ़ हो चुका  है ! संसद में प्रथम दिन की बहस में बसपा सांसदों द्वारा भी एफ.डी.आइ के विरोध में खूब जन हितैषी कसीदे पढ़े गए थे लेकिन एन मौके पर जब उस विरोध को अमली जामा पहनाने की बारी आइ तो ये सारे जन सरोकारी नेता और उनकी पार्टिया बंगले झाकती नजर आईं ! चुकि मायावती पर सी.बी.आइ फैक्टर का दबाव होने के साथ-साथ यू.पी में विपक्ष में होने का दबाव भी है अत: उनके पास सरकार के खिलाफ जाने का कोई औचित्य ही नहीं बनता ! अपनी सियासी सुरक्षा को पुख्ता करते हुए बसपा ने अपने भाषणों से पलटते हुए सरकार को अप्रत्यक्ष मदद करने का समझौता कर लिया ! और सबकुछ वैसा ही हुआ जैसा पहले से तय था !
इस पुरे प्रकरण में ना तो कहीं मुलायम के अंदर समाजवाद ही दिखता है और ना ही मायावती के सियासत में दलित-पिछडों के प्रतिनिधित्व की झलक दिखाई देती है ! समाजवाद की विचारधारा को ताक पर रख कर अगर मुलायम ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का अप्रत्यक्ष समर्थन किया है तो वहीँ मायावती ने कांशीराम के सपनों को तार-तार करने का काम किया है ! सवाल यह भी उठेगा कि एफ.डी.आइ आने से  दलितों का क्या भला होगा,जिनकी  हिमायत करना मायावती की राजनीति का प्रमुख एजेंडा है ?
      हालाकि विपक्ष ने अपने विरोध का धर्म निभाते हुए अंतिम समय तक विरोध को कायम रखा, बेशक किसी जमाने में वो इसके पक्षधर रहे हों ! एफ.डी.आइ के  विरोध में पड़े २१८ मतों को बेशक लोकतांत्रिक पद्धति में हार का नाम दिया जाता हो लेकिन आवाम के राजनीतिक रुख के नजरिये से इन मतों को फिजूल समझना राजनीतिक नजरिये से किसी के लिए भी भारी भूल होगी  ! मायावती और मुलायम के बायकाट करने से ये २१८ मत सरकार पर भारी पड़ सकते हैं क्योंकि इसमें सरकार द्वारा सी,बी,आइ के दुरुपयोग करने का सवाल उठना लाजिमी है ! मुलायम और मायावती के बायकाट को अगर  एफ.डी.आई के विरोध के नजरिये से देखा जाय तो सदन में एफ.डी.आई विधेयक कहीं से भी पास होता नहीं नजर आ रहा, लेकिन ऐसा मानना महज राजनीति का एक व्यवहारिक दृष्टिकोण हो सकता है ना कि सैद्धांतिक पक्ष ! कुछ भी हो संसद में एफ.डी.आइ पर हुए वोटिंग ने देश के तमाम दलों के चेहरे एवं चरित्र से पर्दा उठाने का काम किया है और जनता को सदन के पटल से एक संदेश दिया है कि किस प्रकार उनके प्रतिनिधी  चुने जाने के बाद उनके मतों का दुरपयोग अपने निजी स्वार्थ और महत्वाकाक्षा को साधने के लिए करते हैं ! एफ.डी.आइ पर वोटिंग से कई चेहरे बेनकाब हुए तो वही सरकार द्वारा सी,बी,आई के दुरपयोग की कलई एक बार और खुल कर सामने आई ! खैर, निचले सदन की नूराकुश्ती के बाद अब देखना होगा कि ये नेतागन उच्च  सदन में क्या गुल खिलाते हैं क्योंकि वहाँ सरकार अल्पमत में हैं !!

सरक्रीक मुद्दे पर मोदी का सियासी मकसद : अप्रकाशित लेख





सरक्रीक भी देश की आंतरिक या वाह्य सुरक्षा से जुड़ा कोई मसला है इसके बारे में आम आदमी को शायद ही कुछ ज्यादा पता हो मगर हाल ही में नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को हथियार बनाकर जिस तरह से कांग्रेस  घेरा है,कांग्रेस पीठ दिखाती नजर आ रही है ! इसमें कोई दो राय नहीं कि सियासत की बाजी में मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि उस मुद्दे को जनता के बीच पहुचाने और जनता से जोड़ने की कला महत्वपूर्ण होती है,और कम से कम इस कला में नरेंद्र मोदी माहिर खिलाड़ी हैं ! आज जब सरक्रीक खाड़ी  जैसे ठंढे बस्ते में पड़े सीमा विवाद सहित अंतर्राष्ट्रीय एवं आंतरिक सुरक्षा के राष्ट्रीय मसले को नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस सरकार को घेरने का हथियार बनाया हो तो इसे महज गुजरात के आंतरिक राजनीति के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए,बेशक गुजरात में विधानसभा चुनाव चल रहे हों ! मोदी द्वारा इस मुद्दे के बहाने कांग्रेस सरकार को घेरने का कोई ऐसा मकसद नहीं नजर आता जिससे यह मान लिया जाय कि यह महज गुजरात चुनाव के दृष्टिकोण से भुनाया जा रहा मुद्दा है, भले ही इसका थोड़ा बहुत नफा नुकसान गुजरात चुनाव में भी देखने को मिल जाए ! वैसे भी गुजरात चुनाव में कांग्रेस की स्थिति बिना लड़ाई लड़े ही हारे हुए सिपाही की तरह है जो सिर्फ पूरी शिद्दत से चुनावी औपचारिकाताओं में सहयोग कर लोकतांत्रिक पद्धतियों में में अपनी आस्था दिखा रही हो ! गुजरात चुनाव की सबसे खास बात यह है कि यह राज्य स्तरीय विधान सभा चुनाव होते हुए भी समूचे राष्ट्र के बुद्धिजीवियों एवं जनता के रूचि का विषय बन चुका है बावजूद इसके कि सबको लगभग यह भी पता है कि परिणाम किस करवट उबासियाँ लेगा ! सामान्यत: इन परिस्थितियों में चुनाव उदासीन रहते हैं लेकिन गुजरात इसमें अपवाद हैं ! सरक्रीक मुद्दे पर मोदी की सियासत को इसलिए भी महज गुजरात की सियासत से जोड़ कर देखना उचित नहीं लगता क्योंकि गुजरात में विपक्ष तो वैसे भी मुद्दों का अभाव झेल रही है ! धर्मनिरपेक्षता की सियासत करने वाली कांग्रेस द्वारा गोधरा प्रकरण तक को सशक्त मुद्दा नहीं बनाया जा सका है जिससे कि मोदी पर कुछ हद तक  काबू पाया जा सका !
            विधानसभा चुनावों का अगर चरित्र देखें तो सामान्यतया ये चुनाव क्षेत्रीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं चाहे यू.पी का जातिगत समीकरण हो या महाराष्ट्र का क्षेत्रवाद ! मगर यहाँ भी गुजरात अपवाद बनता जा रहा है, यहाँ विपक्ष द्वारा मोदी को घेरने का कोई पुख्ता मुद्दा नहीं मिल रहा तो दूसरी तरफ मोदी बिना चर्चा में रहे अपनी हैट्रिक लगाने को संतुष्ट नहीं दिख रहे ! बेशक आज नरेंद्र मोदी गुजरात चुनाव लड़ रहे हों लेकिन उनके निशाने पर केन्द्र के सियासत के महारथी ही रहे हैं जिनमे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का नाम प्रमुख है ! गुजरात कांग्रेस के कमजोर पड़ गए संगठन पर समय ना जाया कर सीधे केन्द्र सरकार और उसके प्रमुख नेताओं पर हमला करना यह बताता है कि नरेंद्र मोदी की नजर दिल्ली पर है गुजरात तो महज बहाना है !
      इसी सियासी नजरिये और महत्वाकांक्षा को भुनाने के लिए आज नरेंद्र मोदी द्वारा सरक्रीक मसले को उठाया गया है जिससे सीधे तौर पर केन्द्र सरकार पर निशाना बनाया जा सके और देश की जनता के नजर में उनकी की छवि एक राष्ट्रीय सरोकारों वाले नेता की बन सके ! मोदी की सियासत के संदर्भ में अगर सरक्रीक विवाद को समझने का प्रयास करें पता चलता है कि यह सरक्रीक खाड़ी का काफी पुराना विवाद है जो गुजरात सीमा पर कच्छ से सटे ६५० वर्ग किलोमीटर का समुद्री इलाका है जिसपर पाकिस्तान एवं भारत दोनों देशो द्वारा अपने मालिकाना हक का दावा किया जाता रहा है ! सन १८४२ में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सिंध प्रांत पर कब्ज़ा किये जाने और उसे बंबई राज्य में शामिल करने के बाद यह हिस्सा बम्बई राज्य का हो गया जो कच्छ सीमा से सटे हुए गुजरता है जबकि दिल्ली पर शासन कर रही तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत इस सरक्रीक खाड़ी को भारत के नक़्शे में दिखाती रही ! आजादी के बाद सीमा विवाद का यहाँ मसला हीलाहवाली का ही  शिकार रहा और इसी विवाद के चलते सीमा सटे मछुवारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है  क्योंकि अक्सर पाकिस्तानी मछुवारों को भारतीय सेना द्वारा पकड़ लिया जाता रहा है और भारतीय मछुआरों को पाकिस्तानी सेना द्वारा ! मामले को सलटाने के लिए भारत द्वारा खीचे गए सीमा रखे को पाकिस्तान ने मानने से इनकार कर दिया क्योंकि इस बंटवारे के तहत नब्बे प्रतिशत हिस्सा भारत की सीमा में आ रहा है और दस प्रतिशत पाकिस्तान के हिस्से में ! हालाकि अपुष्ट तौर पर  ही सही मगर ऐसा भी अंदेशा जताया जाता रहा है कि सरक्रीक के इस ६५० वर्ग किलोमीटर में फैले इस हिस्से पर भारी मात्रा में गैस का भण्डार मिलने की संभावना है !
सरक्रीक विवाद के मसले को सुलझाने के लिए प्रधानमत्री के तरफ से पहल किये जाने की सुचना के बाद बेशक भाजपा के किसी केन्द्रीय नेता ने मामले को सियासी मुद्दे में बदलने की चतुराई नहीं दिखाई लेकिन गुजरात से दिल्ली की राह ताक रहे नरेंद्र मोदी को इसमे प्रधानमंत्री और कांग्रेस सरकार को घेरने का एक सियासी हथियार मिल गया ! सरक्रीक मसले पर नरेंद्र मोदी ने जहाँ सरकार को यह कह कर बैकफुट पर ला दिया कि यह जलीय हिस्सा भारत का है और इस हिस्से में आने वाले तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर भारत का ही अधिकार है, अत: सरकार द्वारा अगर १०% से ज्यादा हिस्सा पाकिस्तान को दिया जाता है तो इससे ना सिर्फ कच्छ बल्कि पुरे देश की आंतरिक सुरक्षा एवं आर्थिक व्यवस्था को भारी खतरा उत्पन्न होगा ! देश की आंतरिक सुरक्षा एवं आर्थिक व्यवस्था से जुड़े ठंढे बस्ते में धुल फांक रहे इस मसले को मोदी ने जिस तरह से हथिया लिया है इससे भाजपा के ही कई केन्द्रीय चेहरे मन ही मन ठगा हुआ महसुस कर रहे होंगे ! मोदी द्वारा केन्द्र सरकार को बात बात पर घेरे जाने  को इस नजरिये से भी देखा जाना चाहिए कि मोदी यहाँ सिर्फ सरकार को ही घेर नही रहे बल्कि अपनी पार्टी में भी अपना कद ऊँचा करने की कोशिशें तेज कर रहे हैं ! मोदी को यह बखूबी पता है कि मिशन २०१४ के लिए अगर मोदी का नाम आता है तो इसे भाजपा में बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लिया जाएगा,ऐसा नामुमकिन ही है ! ऐसे में नरेंद्र मोदी खुद को गुजरात की सियासत तक सीमित ना रख कर केन्द्र की सियासत में दाव आजमा रहे हैं ताकि वो देश के राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर कर आ सके !
चाहे सरक्रीक का सीमा विवाद मसला हो या सोनिया गाँधी के विदेश यात्रा पर खर्च का मसला, हर मसले पर मोदी के निशाने पर केन्द्र की सरकार रही है ! गुजरात को लेकर निष्फिक्र मोदी गुजरात के बहाने लोकसभा के लिए अपनी  बुनियाद मजबूत करने की तैयारियां करते नजर आ रहे हैं !गुजरात से बेफिक्र केन्द्र पर नजर गड़ाए सियासत का तापमान माप रहे नरेंद्र मोदी को मिली इस खुली छूट की वजह यह कतई नहीं है कि वो विकास पुरुष का चेहरा रखते हैं ! बल्कि इसके पीछे की मुख्य वजह ये है कि गुजरात में कांग्रेस ना तो संगठन स्तर पा ना ही मुद्दे के स्तर पर ही मोदी का विकल्प प्रस्तुत कर पाई है जिससे कि मोदी को गुजरात की सियासत तक समेट  कर रखा जा सके ! मोदी को मिली इस खुली छूट की वजह यह भी है कि भाजपा के पास भी मोदी से ज्यादा संघ का विश्वस्त कोई नेता नहीं बचा है जिसके अंदर सफलता की संभावना तलाशी जाय ! बेशक आज भी बहुत सारे बड़े चेहरे हों भाजपा में देखने को मिल जाए लेकिन अटल-आडवाणी की जोड़ी के अलावा कोई एक चेहरा नहीं जिसके वजह से भाजपा के सफलता का कोई राष्ट्रीय इतिहास नजर आता हो ! कांग्रेस की गुजरात में कमजोरी औए भाजपा में सफल चेहरों की कमी ने नरेंद्र मोदी को देश की राष्ट्रीय राजनीति में बिन बुलाये हस्तक्षेप करने की अनुमति दे दी है और नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय सियासत की नब्ज को पहचानने में कोई मौका नहीं छोड़ रहे चाहे वो सरक्रीक का मसला हो या कोई और ..!!